Tuesday, December 1, 2009

बलात्कृता

यह कहानीकार की सद्यतम प्रकाशित कहानियों में से है, जो न तो किसी दूसरी भाषा में अनुदित हुई है, न किसी कहानी संग्रह में संकलित हुई है. यह कहानी 'टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप' की ओड़िया पत्रिका 'आमो समय' के जून , २००९ अंक में प्रकाशित हुई है. कहानी का मूल शीर्षक 'धर्षिता' था , पर 'धर्षिता' शब्द हिंदी में न होने के कारण मैंने उस कहानी का शीर्षक 'बलात्कृता' रखना उचित समझा. कहानीकार की सद्यतम कहानी का प्रथम हिंदी अनुवाद पेश करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है.

बलात्कृता

क्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है?

बहुत ही ज्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज्यादा नास्तिक थी वह. कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरें जैसे है.

सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में. एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-वश देखने के लिए या फिर अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिए. घर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था. जीवन तो और भी अस्त-व्यस्त था! दस दिन हो गए थे, इधर-उधर घुमने-फिरने में, आज ही ये लोग अपने घर लौटे थे. रास्ते भर यही सोच-सोचकर आ रहे थे, घर पहुंचकर शांति से गहरी नींद में सो जायेंगे. रात के तीन बजे उनकी ट्रेन अपने स्टेशन पर आनेवाली थी. इसलिए मोबाईल फ़ोन में 'अलार्म' सेट करने के बाद भी, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. पलकें एक मिनट के लिए भी नहीं झपकी थी. थोडी-थोडी देर बाद नींद टूट जाती थी. ट्रेन से उतरकर घर लौटकर देखा था, कि घर अब और कोई आश्रय-स्थल नहीं रहा था.

सुबह से ही घर में लोग जुटने लगे थे. कभी-कभी तीन-चार मिलकर आ रहे थे तो कभी-कभी कोई अकेला ही. सभी को शुरू से उस बात का वर्णन करना पड़ता था, कि यह घटना कैसे घटी होगी.यहाँ तक कि डेमोंस्ट्रेशन करके भी दिखाना पड़ता था. सब कुछ देखने व सुन लेने के बाद, वे लोग यही कहते थे कि आप लोगों को इतना बड़ा खतरा नहीं उठाना चाहिए था. अगर कोई एक आदमी भी घर में रुक जाता तो, शायद आज यह घटना नहीं घटती . ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि अपराधी को हर हालत में अपराध करने का पूरा-पूरा हक़ है. और सुसी के परिवार वालों की भूल है कि उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती.

इन्हीं 'सावधानी' 'सतर्कता' की बातें सुनने से सुसी को लगता था, कि बारिश के लिए छतरी, सांप के लिए लाठी, अँधेरे के लिए टॉर्च का प्रयोग कर जैसे उसकी सारी जिंदगी बीत जायेगी! ऐसा कभी होता है क्या? चारों-दिशायें, चारों-कोनें, ऊपर-नीचे देख-देखकर साबुत जिन्दगी जीना संभव है?

:" आप इंश्योरेंस करवाए थे क्या?"

:" इंश्योरेंस, नहीं, नहीं."

:" करवाना चाहिए था ना!"

सुसी और क्या जबाव देती?इस संसार में सब कुछ क्षणभंगुर और अस्थायी है. जो आज है,कल वह नहीं रहेगा. किस-किस चीज का इंश्योरेंस करवाएगी वह? और किस-किस का नहीं ! घर, गाड़ी, जीवन, आँखें, कान, नाक, ह्रदय, यकृत और वृक्क? इंश्योरेंस कर देने के बाद, 'पाने और खोने' का खेल बंद हो जायेगा? किसी भी रास्ते से तब भी आ पहुँचेगी दुःख और यंत्रणा, तक्षक सांप की तरह!

:"कितना गया?"

:" क्या -क्या गया ? "

धीरे-धीरे, कुछ -कुछ याद कर पा रही थी सुसी . एक के बाद एक चीजें याद आ रही थी उसको . क्या बोल पाती वह ? आते समय , जिस हालत में उसने अपने घर को देखा था बस उसी बात को दुहरा रही थी सभी के सामने .

उस दिन जब उन्होंने अपने घर की खिड़की के टूटे हुए शीशे के छेद में झाँककर देखा , तो दिखाई पड़ी थी अन्धेरें आँगन में चांदनी की तरह फैली हुई रोशनी. आश्चर्य से सुसी ने पूछा था ," अरे ! बेबी के कमरे की लाइट कैसे जल रही है ?" जब कभी वे लोग बाहर जाते थे , तो घर की लाइट बंद करना और ताला लगाने का काम अजितेश का होता था . इसलिए यह प्रश्न अजितेश के लिए था . " आप क्या बेबी के कमरे की लाइट बुझाना भूल गए थे ?" गाडी से सूटकेस व अन्य सामान उतार रहा था अजितेश. कहने लगा था ," मैंने तो स्विच ऑफ किया था ." बेबी बोली थी :-" पापा , आप भूल गए होगे . याद कीजिये जाते समय लोड-शेडिंग हुआ था ना ? ."

ग्रिल का ताला खोल दी थी सुसी . इसके बाद वह मुख्य -द्वार का ताल खोलने लगी थी . ताला खोलकर ,धक्का देने लगी थी .पर जितना भी धक्का दे पर दरवाजा नहीं खुल रहा था . "अरे ! देखो , "चिल्लाकर बोली थी सुसी ,"पता नहीं क्यों ,दरवाजा नहीं खुल रहा है . लगता है किसी ने भीतर से बंद किया है ? कौन है अंदर ? " .सुसी का दिल धड़कने लगा था . वह कांपने लगी थी . " दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है ? " भागकर आया था अजितेश , पीछे -पीछे वह ड्राईवर भी . सुसी ग्रिल के दरवाजे के पास आकर ,टूटे शीशे से बने छेद में से झाँककर देखने लगी वह दृश्य . बड़ा ही ह्रदय विदारक था वह दृश्य! उसकी अलमीरा चित्त सोयी पड़ी थी. दोनों तरफ बाजू फैलाते हुए. खुले पड़े थे अलमीरा के दोनों पट. सुसी की छाती धक्-धक् कांपने लगी थी जोर जोर से.रुआंसी होकर बोली थी,-"हे,देखो!"

:" ऐसा क्यों कर रही हो?" बौखलाकर अजितेश बोला था. इसके बाद उसने बड़े ही धैर्य के साथ पडौसियों को जगाया था. ड्राईवर और पडौसियों को साथ लेकर पीछे वाले दरवाजे की तरफ गया था अजितेश. पीछे का दरवाजा खुला था. पर किसी ने बड़ी सावधानी के साथ, उस दरवाजा को चौखट से सटा दिया था. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजा वास्तव में बंद है.

ड्राईवर कहने लगा-"चलिए,सर! पुलिस स्टेशन चलेंगे." पडौसी सहानुभूति जता रहे थे. कह रहे थे,-" दो-चार दिन पहले, आधी रात को, धड-धड की आवाजें आ रही थी आपके घर की तरफ से. हम तो सोच रहे थे कि शायद कोई पेड़ काट रहा होगा."

अजितेश ड्राईवर को लेकर पुलिस स्टेशन जाते समय यह कहते हुए गया था-" किसी भी चीजों को इधर-उधर मत करना. छूना भी मत. थाने में एफ.आई.आर देकर आ रहा हूँ." अजितेश के जाने के बाद पडौसी भी आपस में चलो चलो कहते हुए अपने घर को लौट गये.

सुसी ने देखा था कि उसका पूरा घर बिखरा-बिखरा , अस्त-व्यस्त पडा था. जो चीज जहाँ होनी चाहिए थी, वहां पर नहीं थी. किसी ने सभी तकियों को फर्श पर बिछा कर, उसके उपर सुला दिया था उसकी अलमीरा को. पास में मूक-दर्शक बनकर खड़ी हुई थी बेबी की वह अलमीरा. जमीन पर बिखरी हुई थी बाज़ार से खरीदी हुई इमिटेशन ज्वैलरी जैसे कान के झुमके,बालियाँ और गले का हार.यहाँ तक कि, भगवान के पूजा-स्थल को भी किसी ने छेड़ दिया था.

सुसी ने सभी कमरों में जाकर देखा था. टीवी अपनी जगह पर ज्यों का त्यों था, कंप्यूटर भी वैसे का वैसे ही पड़ा था. माइक्रो-ओवेन रसोई घर में झपकी लगाकर सोयी हुई थी. और बाकी सभी वस्तुयें अपनी-अपनी जगह पर सुरक्षित थी. पर चोर ने नोकिया का पुराना मोबाइल सेट और एक पुराने कैमरा को अनुपयोगी समझकर बेबी के बिस्तर में फेंक दिया था.

परन्तु जब सुसी ने बेड रूम के बाहर का पर्दा हटाकर देखा, तो वह आर्श्चय-चकित रह गयी यह देखकर कि उस रूम का ताला ज्यों का त्यों लगा हुआ था.अरे! किसीने उस कक्षा को छुआ तक नहीं, उसे ज्यों का त्यों अक्षत छोड़ दिया.

बेबी ने आवाज लगायी, "मम्मी, देखो,देखो."

"क्या हुआ," बेबी के कमरे में घुसते हुए सुसी ने पूछा.

"जिस चोर ने तुम्हारी अलमीरा को तोडा, उसने मेरी अलमीरा को क्यों नहीं तोडा?"

आस-पास ही थी दोनों अलमीरा, बेबी के कमरे में. एक सुसी की अलमीरा, तो दूसरी बेबी की.बेबी की अलमीरा में बेबी की हरेक चीज तथा कपडा रखा जाता था. सुसी की अलमीरा में लॉकर को छोड़ बची हुई जगह में साडी का इतना अधिक्य था कि और साडी रखने से उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता था.

देखते ही देखते सुबह हो गयी.ड्राईवर और अजितेश, पुलिस स्टेशन में थानेदार को न पाकर , उसके घर चले गए थे.थानेदार की किडनी में स्टोन था. वह वेल्लोर से कुछ दिन हुए लौटा था. "मैं सुबह नौ बजे से पहले नहीं आ पाउँगा " बड़े ही कटु आवाज में बोला था थानेदार, " आप लोग जाइये, सब कुछ सजा कर रख दीजिये, मैं नौ बजे तक पहुँचता हूँ."

ड्राईवर की सहायता से नीचे मूर्छित पड़ी अलमीरा को उठाकर खडा किया था अजितेश ने. अब, दोनों अलमीरा पास पास खड़ी हुई थीं.

ड्राईवर ने जाने की इजाज़त मांगी, " तो, मैं जा रहा हूँ ,सर." अजितेश को थानेदार के ऊपर पहले से ही काफी असंतोष था, और ड्राईवर से कहने लगा,"ठीक है, तुम जाओ, और रूककर करोगे भी क्या?" ड्राईवर रात दो बजे से प्रतीक्षा कर रहा था स्टेशन पर. अजितेश का अनुमति पाते ही वह तुरंत रवाना हो गया. किस रस्ते से चोरी हुई होगी, छान-बीन करने के लिए सुसी और अजितेश इधर-उधर देखने लगे. पता चला कि बाथरूम के रोशन दान में लगा हुआ शीशा टूट कर नीचे गिरा हुआ था. चोर जरुर उसी इसी रास्ते से होकर अंदर घुसा होगा, जिसका वह प्रमाण छोड़कर गया कोमोड़ के ऊपर रखा हुआ था फूलदान. आरी-पत्ती की मदद से सब ताले टूटे हुए थे.

सूटकेस, एयर बैग, तब तक ड्राइंग रूम में रखा जा चुका था. इतनी देर तक हाथ-मुहं धोने की भी फुरसत नहीं थी सुसी की. सवेरे-सवेरे टहलते हुए लोग बाहर चारदीवारी का दरवाजा खोलकर घर के भीतर आ गये थे. पता नहीं, इतनी सुबह-सुबह इस घटना की जानकारी लोगों को कैसे मिल गयी?

:" अरे,ये सब कैसे हो गया?"

:" आप लोग कहाँ गये थे?"

:" चार दिन पहले, मोर्निंग-वाक में जाते समय मैंने देखा था की आपके कमरे की एक लाइट जल रही थी. मैंने सोचा कि आप लोग बंद करना भूल गये होंगे."

:" दस दिन के लिए बाहर गये थे? किसी को तो बताकर जाना चाहिए था."

:" आपको पता नहीं है, ये जो जगह है, यहाँ चोरों की भरमार है."

उस समय तक पूरा शरीर थक कर चूर-चूर हो चूका था. एक, उपर से लम्बी यात्रा की थकान; दूसरी, रात भर की अनिद्रा. ऐसा लग रहा था मानो शरीर का पुर्जा-पुर्जा ढीला हो गया हो. लेकिन लोगों का आना-जाना जारी था. जल्दी-जल्दी, घर साफ़ कर पहले जैसी साफ-सुथरी अवस्था में लाने की कोशिश कर रही थी सुसी.

उसने हाथ घुमा कर भीतर से देखा था कि लॉकर के भीतर फूटी कौडी भी नहीं थी और लॉकर बाहर से टूटकर टेढा हो गया था. सोना चांदी के गहने और अब कहाँ होंगे? घर सजाते-सजाते, बाद में सुसी को यह भी पता चला कि पीतल का एक बड़ा शो-पीस, कांसे की लक्ष्मी की मूर्ति, चांदी का कोणार्क-चक्र भी शो-केस में से गायब हैं.

यह सब देखकर बेबी को तो मानो रोना आ गया हो. अजितेश डांटते हुए बोला था," रो क्यों रही हो? ऐसा क्या हो गया है?"

:" मम्मी, देख रही हो, मेरे कान के दो जोड़ी झुमके भी चोर ले गया. चोर मर क्यों नहीं गया? मैं उसको, श्राप देती हूँ कि उसको सात जन्मों तक कोई खाना नहीं मिलेगा?"

:" चुप हो जा, पागल जैसे क्यों हो रही हो?"

सुसी डांटने लगी थी. बेबी को कान के झुमकों के लिए रोते देखकर सुसी को याद आने लगा था अपने सारे गहनों के बारे में.

:" तुम्हारी सोने की एक चेन , मेरा मगल सूत्र, दो चूड़ियाँ इतना ही तो घर में था न?" पूछने लगी थी सुसी बेबी से.

:"और मेरी अंगूठी?" पूछने लगी थी बेबी.

:" हाँ, हाँ, वह अंगूठी भी चली गयी."

:" पापा की गोल्डन पट्टे वाली घड़ी?"

:" ठीक बोल रही हो, वह भी."

:" और याद करो तो बेबी और किस-किस चीज की चोरी हुई होगी?"

:" आप के सोने का हार, उसको आपने कहाँ रखा था?"

:" इमिटेशन डिब्बे में ही तो था. क्रिस्टल के साथ गूँथकर रखा हुआ था." सुसी बेबी के नकली गहनों के सब डिब्बे खोल-कर देखने लगी थी.

:" नहीं, नहीं, यहाँ तो कहीं भी नहीं है." बेबी कह रही थी.

:" एक और बात, अगर आपको पता चल जायेगा तो आपका मन बहुत दुखी हो जायेगा, इसलिए मैं आपको नहीं बता रही हूँ."

सुसी की आँखों में आंसू देखने से जैसे उसको ख़ुशी मिलेगी, उसी लहजे में चिढाते हुए बोली थी बेबी, " बोलूं?"

:" ज्यादा नाटक मत कर, गुस्सा मत दिला.बोल रही हूँ,ऐसे भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा है. तुम्हारे कह देने से और क्या ज्यादा हो जायेगा?"

:" वह बहुमूल्य पत्थरों से जडित चौकोर पेंडेंट, जो आपके बचपन की स्मृति थी, कहाँ गया ? "

बेबी ठीक बोल रही थी,पुराना पेंडेंट चेन से कटकर बाहर निकल आ रहा था, इसीलिए चेन से निकाल कर अलग से रख दी थी सुसी. क्या , किसी ज़माने की एक अनमोल धरोहर थी वह? जब वह हाई-स्कूल में पढ़ती थी तब माँ उसके लिए बनवाई थी बहुमूल्य पत्थर जड़ित अंगूठी, कान के झूमके तथा पेंडेंट के साथ एक सोने की चेन. अब तो माँ भी मर चुकी है., और वह सोनार भी. उस समय तो वह सोनार जवान था. अगर उसको एक अच्छा शिल्पी कहें , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. नए-नए डिजाईन के चित्र बनाकर, नई-नई डिजाईन के गहनें गढ़ना उसकी एक अजीज अभिरुचि हुआ करती थी. छोटे-छोटे छब्बीस नग, बीच में एक बड़ा सा सफ़ेद नग लगा हुआ चौकोर आकार का था वह पेंडेंट. सबसे ज्यादा सुन्दर था वह. सभी बहनें बराबर शिकायत करती रहती थीं उस सोनार ने उनके लिए इतनी सुन्दर डिजाईन क्यों नहीं बनाई? कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थी उस पेंडेंट से. इतने दिनों तक पेंडेंट था उसके साथ. माँ ने अपनी बचत किये हुए पैसों से बनवाई थी उसको. उसकी याद आते ही माँ की बहुत याद आने लगी थी. जब माँ जिन्दा थी, वह उसके महत्त्व को नहीं समझ पाई थी . अभी समझ में आ रहा था कि किस प्रकार एक मध्यम-वर्गीय परिवार की माँ अपने जीवन में पैसा-पैसा जोड़कर बच्चों के लिए बहुत कुछ कर ली थी. आखिर, उसे भी चोर ले गया ?

:" आप दुखी हो गयी हो क्या?माँ, मेरी भी तो चेन और कान की बालियाँ चोरी हो गयी है."

:" बेबी,तुम्हारी माँ तो अभी जिंदा है.तुम्हारे लिए फिर से बनवा देगी. पर, वह पेंडेंट तो मेरे शरीर पर बहुत दिनों तक साथ-साथ था, इसलिए लगाव हो गया था, जैसे कि शरीर का कोई अंग हो."

बेबी फिर एक बार किसी गवांर औरत की भांति चोर को गाली देना शुरू कर दी थी.

:"तू ज्यादा बक-बक मत कर, बहुत काम पडा हुआ है, उसमें मेरा हाथ बटा." कहते हुए बाहर से लाये हुए सूटकेस को खोली थी सुसी.

एक घंटे के बाद अजितेश लौट कर आ गया था.साथ में पुलिस वाले और मटन कि थैली.ऐसे समय में मटन देख कर सुसी का मन आश्चर्य और विरक्ति भाव से भर गयी थी. पुलिस के सामने अजितेश को कुछ भी न बोलते हुए, चुपचाप मटन की थैली को भीतर रख दी थी सुसी.

बाथरूम के रोशनदान के पास जाकर थानेदार अनुमान लगाने लगा था कि एक फुट चौडे रास्ते से तो केवल सात-आठ साल का लड़का ही पार हो सकता है. लेकिन आठ साल का लड़का आरी-पत्ती से सब ताले कैसे खोल पायेगा? इतने बड़े अलमीरा को कैसे सुला पायेगा? ऐसी बहुत सारी अनर्गल बकवास करने के बाद अजितेश, सुसी और बेबी का पूरा नाम, उम्र आदि लिखकर वापस चला गया था. जाते समय यह कहते हुए गया था, अगर मेरी तक़दीर में लिखा होगा, तो आपको आपका सामान वापस मिल जायेगा.

'थानेदार की तक़दीर?' पहले पहले तो कुछ भी समझ नहीं पाई थी सुसी.तभी अजितेश झुंझलाकर बोला,-"पहले जाओ, गेट पर ताला लगाकर आओ, जल्दी-जल्दी खाना बनाओ ,फिर खाना खाकर सोया जाय."

:" जल्दी-जल्दी कैसे खाना पकाऊंगी? क्या सोचकर अपने साथ मटन लेकर आ गए? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे> इधर तो इनके घर में चोरी हुई है, और उधर ये असभ्य लोग मटन खाकर ख़ुशी मना रहे हैं."

:" लोगों का और कुछ काम नहीं है, जो तुम्हारे घर में क्या प़क रहा है देखने के लिए आएंगे?"

तपाक से बेबी बोल उठी,:" पापा, मुझे आश्चर्य हो रहा है, आपको तनिक भी दुख नहीं लगा?"

अजितेश सुलझे हुए शब्दों में कहने लगा,:"जो गया, सो गया. क्या इन चीजों के लिए हम अपना जीवन जीना छोड़ देंगे? मेरी बड़ी दीदी की शादी के पहले दिन, चोर घर में सेंध मारकर शादी के सभी सामान लेकर फरार हो गया. सवेरे-सवेरे जब लोगों ने देखा, तो जोर-जोर से रोना धोना शुरू कर दिए. परन्तु मेरे पिताजी तो ऐसे बैठे थे जैसे उन पर कोई फर्क नहीं पडा हो, एकदम निर्विकार. भोज का सामान फिर से ख़रीदा गया. तथा स्व-जातीय बंधु-बांधवों के सामने वर के पिता को हाथ जोड़कर उन्होंने निवेदन किया था कि एक हफ्ते के अन्दर दहेज़ का सभी सामान खरीदकर पहुंचा देंगे.

प्रेशर-कुकर की सिटी बज रही थी. भांप से मीट पकने की खुशबू भी चारों तरफ फैलने लगी थी. फिर एक बार, ' कालिंग-बेल' बजने लगी थी. कौन आ गया इस दोपहर के समय? रसोई घर से सुसी चिल्लाई,-" बेबी, दरवाजा खोलो तो."

: " माँ, आंटी लोग आये है?" बेबी ने कहा था.

संकोचवश जड़वत हो गयी थी सुसी.कालोनी के सात-आठ औरतें. इधर रसोई घरसे मटन पकने की सुवास चारों तरफ फ़ैल रही थी. कोशिश करने से भी वह छुपा नहीं पायेगी. देखो,कितना पराधीन है इंसान? अपनी मर्जी से वह जी भी नहीं सकता.

फिर एकबार दिखाना पडा सबको वह टूटी हुई अलमीरा को खोलकर.

:"हाँ, देख रहे हैं न?"

:"अन्दर का लॉकर भी."

:"हाँ, उसको तो पीट-पीटकर टेढ़ा कर दिए हैं."

फिर एकबार बाथरूम का टूटा हुआ रोशनदान, फिर एकबार शो-केस की वह खाली जगह,फिर एकबार कितना गया की रट. फट से बेबी बोली,:" ६ जोड़ी कान के झुमके, मेरी चेन, माँ का मंगल सूत्र---"

": इतना सारा सामान आप घर में छोड़कर बाहर चले गए थे? फिर भी मोटा-मोटी कितने का होगा?"

": सत्तर या अस्सी हजार के आस-पास ."

:" लाख बोलिए न, जो रेट बढ़ा है आजकल सोने का.चोर के लिए छोड़कर गए थे जैसे. चोर की तो चांदनी हो गयी."

फिर एक बार प्रेशर-कुकर की सिटी बजने लगी. अब सुसी का चेहरा गंभीर होने लगा. ये औरतें जा क्यों नहीं रही हैं? दोपहर में भी इनका कोई काम-धन्धा नहीं है क्या? घूम-घूमकर सारे कोनों को देख रही हैं. घर की बहुत सारी जगहों पर मकडी के जाले झूल रहे थे, धूल-धन्गड़ जमा था.ये सब उनकी नजरों में आयेगा. और जब ये घर से बाहर जायेंगे, तो इन्हीं बातों की चर्चा भी करेंगे. फिर, उपर से आ रही थी पके हुए मटन की महक.धीरे-धीरे सुसी उनसे हट कर चुप-चाप रहने लगी.ये सब औरतें गप हांक रही थीं. कब, किसके घर कैसे चोरी हुई. इन्हीं सब बातों को लेकर वे रम गयी थीं.

अजितेश कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे खों-खों कर खांसने लगा था .नहीं तो पता नहीं, कितनी देर तक वे औरतें बातें करती?

उस समय तक सुसी को ज्यादा दुःख नहीं हुआ था. लोग आ रहे थे, देख रहे थे, सहानुभूति जता रहे थे. सबको टूटी-फूटी अलमीरा, चोर के घुसने का रास्ता दिखा रही थी. पर जब सुसी पूजा करने गयी, तो मानो उसके धीरज का बांध टूट गया हो.भगवन की छोटी-छोटी मूर्तियाँ, अपने-अपने निश्चित स्थान से गिरी हुई थीं. डिब्बे में से प्रसाद नीचे गिर गया था . धुप, अगरबत्ती, सब बिखरा हुआ था इधर उधर. सिंदूर की डिब्बिया भी गिरी हुई थी. होम की लकड़ियां भी बिखरी हुई थी इधर-उधर.चोर उपवास-व्रत वाली किताबों की पोटली खोलकर लगभग तीस चांदी के सिक्कों को भी ले गया था.कितने सालों से धन-तेरस पर खरीद कर इकट्ठी की थी सुसी ने. एक ही झटके में सारी स्मृतियाँ विलीन सी हो गयी.

भगवान की मूर्ति को किसी गंदे हाथों ने जरुर छुआ होगा.उनकी अनुपस्थिति में चोर ने जरुर इधर-उधर स्पर्श किया होगा. मन के अन्दर से उठते हुए विचार, तुरन्त ही असहायता में बदल गए हो जैसे. सुसी के घर में और कुछ छुपी हुई चीज बाकी नहीं थी.चोर को तो जैसे हरेक जगह का पता चल गया था. उसका घर अब उसे घर जैसा नहीं लगा.फटे-पुराने कपड़ों से लेकर, कीमती सिल्क की साड़ी कहाँ रखती थी सुसी, मानो चोर को सब मालूम हो गया था. दीवार की छोटी से छोटी दरार से लेकर घर की बड़ी से बड़ी, गुप्त से गुप्त जगह की जानकारी भी थी चोर के पास.

तुरन्त ही सुसी को याद आ गया टूटे हुए शीशे के अन्दर से दिखा हुआ अलमीरा का वह ह्रदय-विदारक दृश्य. ऐसे चित्त सोयी पड़ी थी वह अलमीरा, जैसे किसी ने उसे जमीन पर लिटाकर जबरदस्ती उसके साथ बलात्कार कर दिया हो. खुले हुए दोनों पट ऐसे लग रहे थे, मानो उस नारी ने अपनी कमजोर बाहें विवश होकर फैला दी हो. पूरे शरीर पर दाग ही दाग., मानो शैतान के नाखूनों से लहू-लुहान होकर हवश का शिकार बन गयी हो. रंग की परत हटकर प्राइमर तो ऐसे दिख रहा था मानो लाल-लाल खून के धब्बे दिख रहे हो. दुखी मन से सुसी की छाती भर आयी थी . फिर अपने-आपको संभालते हुए बोली थी ,-"अरे, सुन रहे हो?"

खाने का इंतज़ार करते-करते नींद से बोझिल सा हो रहा था अजितेश. सुसी की आवाज सुनकर नींद में ही बड़बड़ाने लगा,: " क्या हुआ ?"

क्या बोल पाती सूसी? उसके अन्दर तो फूट रही थी एक अजीब से अनुभव की ज्वालामुखी! कैसे बखान कर पायेगी किसी को?चुप हो गयी थी सुसी.

:" क्या हो गया? क्यों बुला रही थी?"

फिर से अजितेश ने पूछा, "जल्दी पूजा खत्म करो, मुझे जोरों की नींद लग रही है. खाना खाते ही सो जाऊंगा."

भगवान की मूर्तियाँ अब उसे अछूत लगने लगी थीं. चोर ने उन सबको बच्चों के खिलौनों के भांति लुढ़का दिया था. उसके कठोर, गंदे हाथों ने स्पर्श किया होगा उन मूर्तियों को . उसने संक्षिप्त में ही सारी पूजा समाप्त कर दी.

खाना परोसते समय और एक बार अनमने ढंग से बोलने लगी थी सुसी,:" सुन रहे हो ?"

:" क्या हुआ ?" इस बार गुस्से से बोला था अजितेश,"क्या बोलना है , बोल क्यों नहीं रही हो ? एक घंटा हो गया सिर्फ 'सुनते हो' 'सुनते हो' बोल रही हो."

:" मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है." बोली थी सुसी.

:" कौन सी बड़ी बात है? यह तो स्वाभाविक है. चोरी हुई है, मन को तो जरुर ख़राब लग रहा होगा."

:" नहीं ऐसी बात नहीं,:

:" फिर , क्या बात है?"

:" मुझे ऐसा लग रहा है हमारे घर का कुछ भी गोपनीय नहीं बचा है. किसी ने अपने गंदे हाथ से सब कुछ छू लिया है. ऐसा कुछ बचा नहीं जो अन-देखा हो"

अजितेश आश्चर्य-चकित हो कर देखने लगा था सुसी को. ऐसा लग रहा था , जैसे सुसी के सभी दुखों का बाँध ढहकर भी अजितेश के ह्रदय को छू नहीं पा रहा हो.

Sunday, November 1, 2009

अमृत-प्रतीक्षा

प्रस्तुत कहानी लेखिका के 'ओड़िशा साहित्य अकादमी' द्वारा पुरस्कृत कहानी-संग्रह 'अमृत प्रतीक्षारे'में से ली गई है. मूल रूप से यह कहानी १९८६ में लिखी गई थी और तत्कालीन ओड़िया भाषा की प्रसिद्ध पत्रिका 'झंकार' में प्रकाशित हुई थी. बाद में इस कहानी का अंग्रेजी रूपांतरण 'वेटिंग फॉर मन्ना' शीर्षक से इप्सिता षडंगी ने किया , जो लेखिका के दूसरे अंग्रेजी कहानी-संग्रह 'वेटिंग फॉर मन्ना' ( ISBN: 978-81-906956) में शीर्षक कहानी के रूप में संकलित हुई है.

डॉ सरोजिनी साहू का विश्व की नारीवादी लेखिकाओं में एक विशिष्ट स्थान हैं. पाश्चात्य नारीवाद में उभरे मातृत्व के प्रति घृणा तथा वैराग्य के विपरीत मातृत्व को नारीत्व के एक अहम् हिस्सा मानने वाली यह कहानी लेखिका के नारीवादी विचारधारा को प्रस्तुत करती हैं .

अमृत-प्रतीक्षा

गर्भवती नारी को घेरकर वे तीन

कर रहे थे अजस्र अमृत-प्रतीक्षा

मगर बंद करके सिंह-द्वार

सोया था वह महामहिम

चिरनिद्रा में मानो रूठकर

सोया हो बंद अंधेरी कोठरी के अंदर

एक अव्यक्त रूठापन

बढ रहा था तेजी से हृदय स्पंदन

नाप रहा था स्टेथो उसके हृदय की धडकन

देखो !

अचानक पहुँच जाता था पारा

रफ़्तार 140 धड़कन प्रतिमिनिट

सीमातीत ,

प्रतीक्षारत वे तीन, कर रहे थे अजरुा अमृत-प्रतीक्षा

बंद थे जैसे विचित्र कैद में

प्रतीक्षा की थकावट ने,

कर दी उनके

नींदों में भी नींदहीनता

सपनीली नींदो में स्वप्नहीनता

ना वे जमीन पर पैर बढा सकते थे

ना वे, गगन में पंछी बन उड सकते थे।

प्रतीक्षारत वे तीन,

कर रहे थे अजस्र अमृत-प्रतीक्षा

कि कब

निबुज कोठरी का दरवाजा खोल

मायावी जठर की कैद तोड

सुबह की धूप की तरह

हँसते-हँसते वह कहेगा

लो, देखो मैं आ गया हूँ।

भूल गया मैं सारा गुस्सा,

सारा रुठापन,

विगत महीनों की असह्य यंत्रणा

कब वह घड़ी आएगी

जब खत्म होगी वह अजरुा अमृत-प्रतीक्षा

कब होंगे वे सब मुक्त बंद कैद से,

जब होगा वह महामहिम जठर मुक्त ?

कहीं ऐसा न हो

गर्भवती नारी के साथ-साथ

उनको भी लेना होगा पुनर्जन्म

एक बार फिर नया जन्म

पारामिता के शरीर से झरने की भाँति पसीना बह रहा था । उसकी आंखो में नींद का नामोनिशान न था। कुछ देर पहले ही एक नर्स उसको जगाकर चली गई।

अरे ! बेबी कहाँ है ? शिशु-विशेषज्ञ डा. साहब आए हैं, बेबी का चेक-अप करेंगे। पर, बेबी कहाँ है ?”

तन्द्रालु पारामिता ने आश्चर्य-चकित होकर कहा ,

बेबी ? कैसी बेबी ? यहाँ तो कोई बेबी नहीं है।

अचानक उसे याद आ गया,एक मैडम सुबह उसके पेडू को देखकर बोल कर गई थी ऐसा लग रहा है कि तुम्हारे बेबी का आकार छोटा है। हमने शिशु-विशेषज्ञ डा.साहब को खबर कर दी हैं,वह यहाँ आकर एक बार बेबी का आकार देख लेंगे।

उस चश्मीच गंजे डॉक्टर ने बडे ही गंभीरतापूर्वक पारामिता के पेडू की जाँच की। बोलने लगे सचमुच बच्चे का आकार तो छोटा लग रहा है।फिर कुछ सोचते हुए एक पर्ची पर कुछ दवाइयाँ लिखकर वहाँ से चले गए। पारामिता ने उस पर्ची को एक चटाई के नीचे संभाल कर रख दिया। उसे आश्चर्य हो रहा था, प्रसव में तो बहुत कम दिन बचे हैं इतने कम दिनों में पेट के अंदर ही बच्चे का आकार बड़ा कर देंगे ये लोग !जिस प्रकार बच्चों की किताबों में टॉम-थम्बकी कहानियों का जिक्र आता है, कहीं वह उसकी तरह तो पैदा नहीं होगा ? ऐसे बामन बच्चे को लेकर क्या करेगी ? किस प्रकार अपना सारा जीवन-यापन करेगी ? यही सोचकर पारामिता डर से काँपने लगती थी। क्या वास्तव में उदरस्थ शिशु का स्पंदन इतने धीमे है जैसे कि यह आदमी का बच्चा न होकर किसी दूसरे प्राणी का बच्चा है ? ऐसी ही कई बातें पारामिता ने पहले से ही सुन रखी थी कि किसी-किसी के तो विकलांग बच्चे भी पैदा होते हैं। जितना ही इस संदर्भ में वह सोचती, उतना ही वह अनजाने भय से सिहर उठती। ना तो उसके पास पार्थ था, ना ही पापा। बाथरुम के पास खाली जगह पर, अकेली माँ अपने शरीर को समेटकर कर सोई हुई थी। अगर पार्थ और पापा में से कोई भी पास में होता तो वह उन्हें डॉक्टर की पर्ची दिखाती तथा दवाइयों के बारे में पूछती। उसे यह बात मंजूर थी कि भले ही उसका बच्चा सुंदर नहीं हो तो भी कोई दुःख की बात नहीं है, मगर उसकी हार्दिक मनोकामना थी कि उसके एक स्वस्थ बच्चा पैदा हो।

पारामिता को ऐसा अनुभव हो रहा था कि उसके अंतरतम से शिशु-रोदन की एक आवाज सुनाई पड़ रही है, और अगर कुछ समय तक अकेली रही तो वह रो पड़ेगी। जितने भी डॉक्टर देखने आए सभी की राय एक ही थीं, “बेबी का आकार बहुत छोटा है !पारामिता को पहले से ही इस बात की जानकारी थी कि पाँच पाउंड से कम वजन वाले बच्चे पैदा होते ही या तो मर जाते हैं, या फिर जल्दी ही किसी न किसी रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। वे ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रह पाते। जिस बच्चे के लिए पारामिता ने इतनी प्रतीक्षा, इतनी पूजा-अर्चना और इतनी साधना-आराधना की , आज इस बच्चे के बारे में कोई सोच भी नहीं रहा है। यही सोचकर पारामिता के मन में अपने आत्मीय-जनों के प्रति एक खटास-सी पैदा हो गई।

क्या कर रहे हैं ये सब लोग ? आपस में लड़-झगड़ रहे हैं अपने लिए या उसके बच्चे के लिए ? या तो इन लोगों ने एक दूसरा मुखौटा पहन लिया है या फिर अपने असली मुखौटों को उतारकर दूसरे प्रकार के आदमी बन गए हैं। जिस पार्थ के साथ वह विगत चार सालों से गृहस्थ-जीवन यापन कर रही थी , वह पार्थ तो यह नहीं लग रहा है। जिस मम्मी-पापा को बचपन से देखती आई हैं , क्या ये वही मम्मी-पापा हैं ?

सोने के कुछ समय पहले ही उन लोगों में काफी तेज वाक-युद्ध हुआ था। एक छोटी-सी बात पर, वह भी सोने की बात को लेकर। पता नहीं, क्यों हर छोटी-मोटी बात को लेकर उनके बीच में मत-भेद होता रहता था ? पारमिता की समझ में नहीं आ रहा था पार्थ का त्याग करना उचित था अथवा मम्मी-पापा का ? एक छोटी-सी खाली जगह के लिए तीन-तीन जनों की दावेदारी ! खाना खाकर पार्थ सबसे पहले उस जगह पर जाकर लेट गया ,लेटते ही उनकी आँखें लग गईं । सचमुच में ऐसे ही उनको नींद आ गई, या वह जान-बूझकर वहाँ सोए थे। पार्थ का इतना लंबा-चौड़ा शरीर ! ऊपर से सूटकेस, बास्केट, सुराही, टिफिन कैरियर आदि फिर कहाँ से बचती कुछ खाली जगह ? चाहती तो मम्मी, पार्थ को मृदु-भाषा में समझा-बुझाकर वहाँ से उठा सकती थी, मगर उनका इस तरह सोना मम्मी को बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। जैसे ही पापा बाथरुम से निकले, वह बोलने लगी, “देखिए, मेरी पान की डिबिया उधर पड़ी है, और दामाद जी तो यहाँ हर समय ऐसे सोए रहते हैं कि चाहने से भी पान की डिबिया नहीं ला पा रही हूँ। खाना खाने के बाद कब से इच्छा हो रही है कि पान का एक बीड़ा खा लूँ, पर दामाद जी तो......

पापा ने मुँह पर अँगुली श..श..शकहते हुए मम्मी को चुप रहने का संकेत किया। पारामिता ने झुककर पान की डिब्बी उठाई। पार्थ को थोडा सरकाकर बोलने लगी, “अभी तक सो रहे हो ! पापा आठ किलोमीटर दूरी से साईकिल पर जाकर हमारे लिए खाना लाते हैं। क्या उनको थकान नहीं लगती ? क्या उनको विश्राम की जरुरत नहीं हैं ? थोड़ा उधर सरकिए ?”

और कहाँ सरकूँगा ? पूरा तो बेड के नीचे घुस गया हूँ।नींद में ही बड़बड़ाने लगा था पार्थ।

तो क्या पापा नहीं सोएँगे ?”

पापा का नाम सुनते ही पार्थ झट से उठ गया था और चिल्लाकर कहने लगा,

मैं तो सोने नीचे जा रहा था। क्यों मुझे मना कर रही थी ?”

आप ही तो बोल रहे थे, नीचे तो बैठने के लिए भी जगह नहीं है।

तुम्हें क्या दिक्कत है ? मैं नीचे बैठूँ या बाहर घूमुँ ?”

इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो ? दोपहर घूमने-फिरने का समय है ?”

गुस्सा नहीं करूँगा तो क्या करूँगा ? नीचे नहीं जा सकता, बाहर भी नहीं घूम सकता, यहाँ सो भी नहीं सकता, तब और क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? कहिए

पापा बेड-शीट और तकिया अपने साथ ले जाते हुए बोले तुम शांति से सो जाओ, बेटा ! इन लोगों की बातों पर ध्यान मत दो। मैं जा रहा हूँ ऊपर वाली मंजिल में वहाँ बढ़िया हवा आती है। वहाँ जाकर सो जाऊँगा। चिन्ता मत करो।

आप यहाँ सोइए, मैं नीचे जा रहा हूँ। ऊपर और कहाँ सो पाएँगे ? वहाँ तो भवन-निर्माण का काम चल रहा है। सीमेन्ट के बोरें पड़े हैं ,सारी फ़र्श धूल-धूसरित हैं और कामगार व मिस्त्री लोगों के काम करने की खटखट की आवाज से परेशान हो जाओगे।

मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। तुम आराम से यहाँ सो जाओ, बेटा !यह कहते हुए पापा बेड शीट और तकिया लेकर बाहर चले गए। उनको बाहर जाता देख पार्थ मुँह फुलाकर नीचे चला गया।

पारामिता का मन दोनों पार्थ और पापा के लिए दुःखी हो रहा था। उसको लग रहा था कि ऊपर मंजिल जहाँ काम चल रहा है, केवल छत ही बनी होगी। उस आधे तैयार मकान में जमीन पर बेड-शीट बिछाकर धूल भरे माहौल में बूढे-पिताजी सोते हुए बार-बार करवटें बदल रहे होंगे , दो घंटे से किस प्रकार असहनीय यंत्रणा को सह रहे होंगे । उधर शायद नीचे पार्थ को भी थोड़ी-सी जगह नहीं मिली होगी। वह इस भरी दुपहरी में तपती धूप के अंदर यहाँ-वहाँ भटक रहे होंगे या फिर नर्सिंग होम के दरवाजे के सहारे खड़ा होकर सिगरेट पी रहे होंगे। वहीं नजदीक में एक नेपाली दरबान स्टूल पर बैठे-बठे झपकी लगा रहा होगा।

उसका मन बार-बार उनके लिए कराह रहा था कि एक बार ऊपर जाकर पापा को देख आएँ और एक बार नीचे जाकर पार्थ को। मगर क्या करे ? उसके लिए सीढ़ी चढ़ना-उतरना मना है।

इतना कुछ घटित होने के बावजूद भी जैसे कुछ भी घटना नहीं घटी हो, माँ अनजान-सी बनकर पान बना रही थीं। उन दोनों के जाने के बाद पास वाले बेड में सो रही पारामिता की हम-उम्र जयन्ती को देखकर वह बोलने लगी थीं,

इतना गुस्सा किस बात के लिए ? बोलो तो बेटी ! हम लोग उनकी पत्नी और बच्चे के लिए यहाँ पडे हुए हैं या नहीं ? सच बता रही हूँ उनके तेवर देखकर मुझे यहाँ रहने का कतई मन नहीं हो रहा है। लेकिन बेटी को इस हालत में छोड़कर घर जाने से लोग क्या कहेंगे ?”

पारामिता की तरफ देखकर फिर जयंती को बोलने लगी,

माँ मंगला देवी को नमन करती हूँ कि कितनी जल्दी मेरी बेटी को बच्चा हो जाए !

पारामिता की तरफ देखकर जयंती हँसने लगी। यह समस्या तो उसके साथ भी थी। बहुत सारे डॉक्टरों व अस्पतालों का चक्कर काटने के बाद वह यहाँ पहुँची थी। उसने ऑपरेशन तो पहले भी नहीं करवाया था। जयंती की फैलोपियन टयूब में श्लेष्मा बनने की बीमारी थी, इसलिए शादी के बारह साल गुजर जाने के बाद भी मातृत्व-सुख से वह वंचित थी। ऐसा क्यों होता है ? पृथ्वी के किसी भू-भाग में अकाल तो किसी भू-भाग में हरियाली ही हरियाली।

जयंती की माँ एक दिन बता रही थी, “घर में खेती-बाड़ी है, धन-संपति की कोई कमी नहीं है मगर उपभोग करने वाला कोई वारिस नहीं है। बेटी की यही चिन्ता मुझे ज्यादा खाए जाती है। यही कारण है, मैं अपना घर-बार छोड़कर यहाँ पड़ी हुई हूँ। इसके पापा सब-डिविजनल ऑफिसर है, उनके पास तो बिल्कुल फुर्सत नहीं है। मेरा बेटा ब्रह्मपुर मेड़िकल कॉलेज में पढ़ता है। उसने हमें इस नर्सिंग-होम में भर्ती करवाया है। उसको बीच-बीच में फोन करने के लिए बोली थी। इससे बढ़कर और मैं क्या करुँगी ? अगर मैं यहाँ से चली जाऊँगी तो मेरा दामाद कुछ भी नहीं कर पाएगा। देख नहीं रहे हो, किस प्रकार दामाद बेचैन हो रहे हैं ? बेटे का एक दोस्त इस नर्सिंग-होम में काम करता है इसलिए ध्यान रखने के लिए बेटा उसको हमारे बारे में बता कर गया है।

पारामिता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि जयंती की माँ अपने दामाद को बिल्कुल पसंद नहीं करती है। छोटी-मोटी हर बात पर टोकती रहती है और अगर दो-चार लोग मौजूद हों तो कहना ही क्या ! ताने पर ताना मारकर दामाद की खिल्ली उड़ाती है। इतना अपमानित करने के पीछे एक ही कारण है जयंती का पति पढ़ा-लिखा नहीं है, वह केवल खेती-बाड़ी करता है ! चूँकि जयंती का रंग काला था, अतः उसकी शादी में कई अड़चने आ रही थी। कॉलेज की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाई थी कि उसकी शादी इस लड़के के साथ करवा दी गई। दामाद के पास वैसे तो बहुत सारे खेत-खलिहान हैं, मगर जयंती के पिताजी के तुल्य ओहदे वाले नहीं हैं। यही सोचकर जयंती की माँ उनको बार-बार नीचा दिखाती थी।

कभी-कभी तो जयंती अपमान के इन घूंटों को चुपचाप पी जाती थी, पर कभी-कभी बरदाश्त से बाहर होने पर वह अकेले बैठकर रोने लगती थी। यह देखकर पारामिता का मन बड़ा दुःखी हो जाता था। एक बार उसने जयंती को समझाया भी था यह कहकर-

खासकर इन फालतू-बातों को लेकर आपका रोना-धोना अनुचित है। आप तो खुद बड़ी समझदार औरत हैं। इतना संवेदनशील होने से चलेगा ! ऊपर से आपकी तबीयत भी ठीक नहीं है। नीचे जो दो टाँके लगे हुए हैं, वे भी पक गए हैं। उनमें सेप्टिक हो गया है। उस दिन डॉक्टर भी बता रहे थे कि धीरे-धीरे यह संक्रमण शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल रहा है। इस हालत में रोने-धोने से घाव भरने में भी परेशानी होगी।

मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, न बाल-बच्चा और न ही कोई घर-बाररोते-रोते बोलने लगी थी जयंती। अभी तक तो मेरा कोई बच्चा नहीं है, और आगे नहीं होगा तो क्या होगा ? नहीं होगा। दूसरी बात मैं कितने साल और जिन्दा रहूँगी ? जब एक चीज का अभाव है, तब इतनी सारी बातें सुननी पड़ती है, इतना कुछ सहन करना पड़ता है। माँ के मन में जब जो कुछ आता है, बकती जाती हैं। मैं उनकी धर्म-पत्नी हूँ तथा इनकी बेटी हूँ। इसलिए ये दोनों ही मुझ पर जितना चाहें उतना गुस्सा निकाल सकते हैं।

पारामिता इस बात को समझ नहीं पाती थी कि इंसान-इंसान के बीच आत्मीयता का इतना अभाव क्यों ? मानो सभी ने अपनी स्वेच्छा से स्वतंत्र जीवन जीना स्वीकार कर लिया हो तथा उनके बीच में संदेह, अविश्वास और नफरत के कुँहासे की अभेद्य दीवार खड़ी हो गई हो । इस पार से उस पार किसी को कुछ भी नहीं दिखता है। जयंती से पहले, इस बेड पर हेमा बेहेरा भर्ती थी। वह पूर्णतया अनपढ़ , अपरिष्कृत तथा देहाती औरत थी। उसके पास परिचारक के तौर पर उसके पति साथ थे, जो कलकत्ता की किसी जूट-मिल में कैजुअल-कामगार के रूप में काम करते थे। उन पति-पत्नी के बीच पारामिता ने अप्रेम,अविश्वास और संदेह की प्राचीर का अनुमान कर लिया था। हेमा बेहेरा के पहले इस बिस्तर पर एक अधेड-उम्र की वृद्धा औरत भर्ती थी और परिचारक के रूप साथ में थे उनके पति, जो कुछ ही दिनों में नौकरी से सेवा-निवृत्त भी होने वाले थे। उनका एक बेटा भुवनेश्वर में बड़ा आफिसर था। दोनों बूढ़ा-बूढ़ी का स्वभाव एक दूसरे से सर्वथा विपरीत था। एक उत्तर चलता था तो दूसरा दक्षिण। मगर गृहस्थ-धर्म में बँधे हुए थे। उनका अपना खून उनका बेटा उन लोगों से कटा-कटा रहता था। पारामिता कई दिनों से इस बात पर गौर कर रही थी, जितने भी लोग इस कैबिन में आए, आते समय एक आत्मीयता के बंधन में बँधे हुए थे परन्तु इस छोटे-से दसफुट गुणा बारह फुट आकार के घर के आधे भाग में साथ-साथ रहने के कुछ ही दिनों के बाद उनमें एक वैर-भाव जागृत हो जाता था। एक-दूसरे के प्रति असहिष्णुता कभी-कभी तो अपने चरम को पार कर जाती थी। तब वह यह समझ नहीं पाती थी कि यथार्थ में कौन-सा रिश्ता अच्छा है ? केबिन में आते समय का प्रेम-भरा रिश्ता अथवा केबिन में रहते समय रिश्तों के जिन रूपों को पारिमिता ने देखे वे रिश्ते ?

उस बूढ़ी औरत का एपीसीटोमी का ऑपरेशन हुआ था। पारामिता जिस दिन इस नर्सिंग-होम में भर्ती हुई थी, अपना सामान सूटकेस, बास्केट आदि कैबिन में लाते समय उस अधमरी अवस्था में पड़ी हुई बूढ़ी को देखा था। एक हाथ में सलाइन लगा हुआ था, जिसको पकड़कर उनके पति एक फोÏल्डग-चेअर में बैठे हुए थे। उसको कुछ ही देर पहले ऑपरेशन थियेटर से बाहर लाया गया था। पास में न सगे-संबंधियों की भीड़ थीं न ही किसी को कोई तत्परता या व्यस्तता थी।

बेटे को छोड़़कर उन बूढ़ा-बूढ़ी के पास कोई भी मिलने वाला नहीं आता था। सुबह कच्चे नारियल का पानी, बिस्कुट तथा दिन में ग्यारह बजे पूर्व-निश्चित किसी होटल से खाना लेकर उसका बूढ़ा पति आता था। दिन में तीन बजे हार्लिक्स तथा रात को खाने को दो रोटी दी जाती थी बूढ़ी को। इस प्रकार की दिनचर्या थी इन लोगों की। इस प्रकार उनके दिन-रात कट रहे थे।

पारिमिता को आश्चर्य लगता था ऑपरेशन होने के छः-सात दिन बाद भी उस वृद्धा औरत का हाल-चाल पूछने कोई नहीं आया। एक बार उनकी बहू जरूर आई थी दोपहर के समय में उनको देखने। केवल तीस-पैंतीस मिनट रूकी और लौट गई। जाते समय उसका मूड़ उखड़ा हुआ था। पारामिता इसके लिए अपने मम्मी-पापा को दोषी मान रही थी। बहुत ही मामूली-सी घटना थी। जब बहू पारामिता के साथ बात कर रही थी तब बुढ़िया को खूब जोर से पेशाब लगा था। वह अपने बिस्तर से उतर कर जमीन पर केंचुए की तरह रेंगती-रेंगती बाथरूम के तरफ जा रही थी। बूढ़ी का बिस्तर से उतरना, रेंगते हुए बाथरूम की तरफ जाना और पुनः बिस्तर पर चढ़ना, ये सभी दृश्य पापा की नजरों में आ गए। पता नहीं क्यों वह अपने आप पर काबू नहीं रख पाए। बहू की तरफ इशारा करते हुए बोलने लगे, “बेटी, तुम भी जाओ उनके साथ। बूढ़ी है, कहीं गिर न जाए।

बहू रूमाल से खुद को हवा देते हुए बोली, “वह खुद का काम खुद कर लेती हैं। उनको पकडने की कोई जरूरत नहीं है।

माँ से भी नहीं रहा गया, वह तुरंत बोल पडी, “तब दूसरा समय था, अब दूसरा समय है। उनकी तबीयत खराब है ना !

बहू बिना कुछ बोले उठकर बाथरूम के अंदर चली गई। सास के अंदर से बाहर आने के बाद वह ससुर को बिना मिले ही लौट गई । बूढे के आने के बाद पारामिता के पापा इस बात को जितना बल देकर कह रहे थे, परन्तु बूढ़ा-बूढ़ी दोनों इस विषय पर कुछ भी रूचि नहीं दिखा रहे थे। यह सब देखकर पारामिता को ऐसा लग रहा था मानो जीवन के इस मोड़ पर उनके पास बोलने के लिए कुछ भी शब्द नहीं थे, क्योंकि जीवन के इस कड़वे सत्य को उन्होंने यथार्थ रूप से स्वीकार कर लिया था तथा आगे सुधार हो ,इस बारे में वे कुछ भी आशान्वित नहीं थे।

एक दिन पारामिता चुपचाप बैठकर शून्य को निहार रही थी। वह बूढ़ा आदमी फोÏल्डग-चेअर में बैठकर दोनों टाँगों को ऊपर की तरफ उठा लिया था। सीलींग-फेन की तरफ अपलक देखते हुए वह बोल रहा था,

बेटी ! समझी, मैं वृन्दावन जा रहा था। पर अब कहाँ जाऊँगा ? आधे रास्ते में यहीं पर अटक गया हूँ। पता नहीं, क्या पाप किए थे मैंने ? इस उम्र में भी वृन्दावन जाने का संयोग नहीं बन रहा है।

बुढ़िया नींद में सोई हुई थी। पारामिता के पापा दोपहर का खाना लाने बुआ के घर गए हुए थे। माँ पास के केबिन में किसी के साथ बातचीत कर रही थीं । इधर वह बूढा कहता ही जा रहा था,

बेटी, मैं सेवा-निवृत हो गया हूँ। बहुत दिनों तक मैंने नौकरी कर ली। कहीं पर भी आना-जाना नहीं कर पाया। कभी-कभार छुट्टी मिलने पर पुरी-तीर्थ की तरफ जाता था। मन में बहुत बड़ी इच्छा थी कि जब मैं सेवा-निवृत हो जाऊँगा, तो एक बार वृन्दावन अवश्य जाऊँगा। यही तो मात्र एक इच्छा थी, बेटी ! जब मैं वृन्दावन जाने की तैयारी कर रहा था, तब यह बूढ़ी कहने लगी कि वृन्दावन जाने से पहले बहू-बेटा को मिलते हुए जाना। बेटे को मेरे कमर के दर्द के बारे में भी बताना, ताकि वह मुझे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा देगा। इस बाबत मैं भुवनेश्वर आया था और देखो, यहाँ अटक कर रह गया। बेटा कहने लगा, जब तक मैं माँ को किसी डॉक्टर से नहीं दिखा लेता हूँ, आप मत जाइएगा। आप पहले उन्हें गाँव में छोडकर, फिर जहाँ जाना हो वहाँ प्रस्थान कर लीजिएगा। देख रही हो बेटी, मेरा यह वृन्दावन !

उस बूढे की इन बातों में बेटे के लिए उतनी नहीं, जितनी बुढ़िया के लिए विरक्ति मालूम पड़ती थी। मानो बूढ़ी एक केकड़ा हो तथा उनके पाँव को जोर से जकड़ ली हो। उनके लिए एक-दूसरे से अलग होना तभी संभव है जब उनमें से कोई एक मर नहीं जाता। एक दिन बूढ़ी रात को दस बजे अपने बिस्तर से झुक-झुककर चली गई थी। भुवनेश्वर से उनका बेटा कार लेकर लेने आया था। बूढ़ा-बूढ़ी जितने भी दिन यहाँ भर्ती थे, बेटा मिलने केवल दो ही बार आया था वह भी इसी रात की तरह नौ-दस बजे के समय। बहुत हडबड़ी में रहता था और कुछ कहते हुए चला जाता था। बैठकर भी नहीं, खडे-खडे बातें करता था

कैसी हो ?”

वृद्धा माँ इससे पहले कुछ उत्तर देती, वह अपने बुजुर्ग पिता की तरफ देखते हुए बोलने लगता था

पापा, डॉक्टर ने दवाई लिखी हैं ? लाना है तो पर्ची दो, मैं लेकर आता हूँ।

यह सुनकर वह बूढ़ा शेल्फ में पर्ची ढूँढना शुरु कर देता और बुढ़िया रोते-रोते नाक में बोलती-

मेरे प्यारे बेटे ! क्यों तुमने मुझे अपना खून दिया ? मेरे बेटे के शरीर से कितना खून मैंने ले लिया ? मुझे अब जिन्दा रह कर क्या करना है ? मैं तो अब मर जाऊँगी। अहा ! अहा ! मेरे बेटे के शरीर से इतना खून ले लिया मैने !....

बुढ़िया भावुकतावश अपने बेटे का हाथ छूने की कोशिश करने लगी , तभी बूढे ने शेल्फ से खोजकर वह पर्ची निकालकर बेटे को थमा दी । बेटा कहने लगा था,

बस, आधे घंटे में सारी दवाइयाँ ले आता हूँ।यह कहते हुए वह आँधी की तरह निकल जाता था। पारामिता को ये सब किसी उद्भट नाटक के दृश्यों की भाँति लगने लगता था। ऐसा लगने के पीछे एक कारण यह भी था, वोल्टेज की कमी की वजह से कमरे का ट्यूबलाइट टिम-टिमा रही थी। इसलिए शाम होते ही ये लोग बैड-लैम्प जला देते थे। जैसे ही बेटा आता था वह ट्यूबलाइट ऑन कर देता था। उस ट्यूबलाइट की मद्धिम टिमटिमाहट में बेटा किसी रंगमंच के पौराणिक उद्भट नाटक के पात्र की तरह चित्र-विचित्र रहस्यमयी भाव भंगिमायुक्त दिखाई देता था और कमरे के सारे परिदृश्य रंगारंग प्रोग्राम की तरह ।

नर्सिंग-होम से डिस्चार्ज होने वाले दिन वह वृद्ध आदमी भोर में जल्दी उठ गया था। उठते ही अपनी दैनिक-दिनचर्या से निवृत होकर उसने अपनी ललाट पर चंदन का टीका लगाया। बेड व शेल्फ के आस-पास उपयोग में लाई हुई दवाइयों के जितने खाली डिब्बे थे, उन सबको पास में रखी हुई कचरे की पेटी में डालकर अपना बक्सा व बेडिंग तैयार किया। वृद्धा ने भी तैयार होकर एक सुंदर-सी साड़ी पहन ली। फिर बाल कंघी कर अपने हाथ से माँग में सिंदूर भर लिया । इसके उपरांत मुख में इलायची के दो दाने डालकर अपने बिस्तर पर सज-धजकर बैठ गई। लेडी डॉक्टर के राउंड पर आने से पूर्व ही बूढे ने कार्यालय में जाकर नर्सिंग-होम के खर्चे का भुगतान कर दिया। लेड़ी डॉक्टर ने बुढ़िया को चेक-अप के बाद वहाँ से डिस्चार्ज होने की अनुमति दे दी। अब दोनों बेटे के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे जो यह कहकर गया था कि नौ-दस बजे वह कार लेकर उनको लेने आएगा। प्रतीक्षा करते-करते दस बज गए, फिर ग्यारह फिर बारह..... मगर बेटा नहीं आया था। जैसे ही बारह बजे, वैसे ही एक नर्स और उसके पीछे स्ट्रेचर पर सलाइन लगा हुआ एक अधमरे -रोगी के साथ उस रूम में घुस आए। मगर वे लोग बिस्तर के पास पहुँचते ही रूक गए।

ऐ मौसी ! उठ, उठ बोलकर वह नर्स चिल्लाने लगी।

बिस्तर से उठने में बुढ़िया को जैसे कष्ट हो रहा हो, देखकर नर्स गुस्से में बोलने लगी

जल्दी उठ न ! कैसे अजीब लोग हैं ये ? सुबह से डिस्चार्ज हो गए हैं, परन्तु अभी तक बिस्तर छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।

जा रही हूँ बेटी, जा रही हूँ।

बुढ़िया असमंजस की स्थिति में थी। समझ नहीं पा रही थी कि कहाँ जाए ? इसी अंतराल में रोगी के साथ वाले सगे-संबंधी लोग भी वहाँ पहुँच गए थे।

पारामिता के पापा ने उन्हें अपने पास बुलाया। उनको वहाँ मात्र ढाई फुट गुणा तीन फुट की जगह मिली थी। इतनी कम जगह में बुढ़िया पापा के पास दीवार के सहारे सटकर बैठी थी, जबकि बूढ़ा नीचे उतर कर अपने बेटे की प्रतीक्षा कर रहा था। जब लौटकर रूम में आया तो बूढ़ी को इस तरह बैठा देखकर बहुत दुःखी हो गया।

क्या करेंगे, जी ? बेटा भुवनेश्वर से अभी तक नहीं आया। मैं बेटे के पास चला जाऊँ क्या ? इतना विलंब क्यों हो गया उसको ? अगर अभी मैं भुवनेश्वर जाता हूँ तो शाम तक गाड़ी लेकर लौट आऊँगा।यह कहते-कहते बूढे ने अपनी बची हुई दवाइयों के डिब्बे, बेडिंग व बक्सा सभी लाकर पारामिता के पास खाली छोटी-सी जगह पर एक के ऊपर एक रख दिए।

वह जरूर आएगा, आप इतना बेचैन क्यों हो रहे हो ?” बुढ़िया ने कहा।

आयेगा, और कब आएगा ?” झुंझलाकर बोला बूढ़ा।

साढ़े बारह बजने जा रहे हैं।

फिर कुछ सोचकर उसने अपना बंद पैकिंग खोला तथा टिफिन-कैरियर बाहर निकाला।

सुबह-सुबह घर चले जाएँगे, सोचकर मैंने कल से होटल में खाने का आर्डर भी निरस्त करवा दिया था। अब तेल-मसाले युक्त खाना खाना पड़ेगा।

न तो वह बूढ़ा भुवनेश्वर जा पाया था, न ही केबिन में शांति से बैठ पाया था। केवल ऊपर नीचे हो रहा था। शाम हो गई थी। ऐसा लग रहा था मानो वृद्ध दम्पति के शरीर से प्राण निकल गए हों और बची रह गई हो जैसे दो प्रेतात्माएँ, दो प्रतिच्छायाएँ, दो वाकहीन अस्थिपंजर और मात्र दो अस्तित्व। बेटा हर-बार की तरह रात को दस बजे आया था। उसे अपनी गलती के लिए जरा-सा भी पछतावा नहीं था। ऐसा बर्ताव करने लगा था, जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो।

चलो, चलिए, सब सामान तैयार हैं ?”

उस बुढ़िया के बिस्तर पर जो मरीज लाया गया था, वह थी हेमा बेहरा। एक देहाती औरत। पारामिता के साथ बातचीत करने के लिए बहुत ही बेताब थी, परन्तु उसकी कुत्सित हँसी और लगातार बकबक करने की आदत देखकर पारामिता उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। यह बात हेमा बेहेरा की समझ में अच्छी तरह से आ गई थी। वह बोलने लगी-

मेरे पास बहुत सारे जेवरात हैं, आप जिस तरह से मुझे देख रही हो, वैसी मैं नहीं हूँ। जब सारा जेवर पहन लूँगी तो एक सुन्दर रानी की तरह दिखूँगी।

इसी बात को बार-बार दोहराती थी वह। पारामिता उसकी इन बातों को सुनकर चौंक गई। सोचने लगी इस औरत की आँखे क्या एक्स-किरणों से भी ज्यादा भेदक क्षमता वाली हैं ? जो बखूबी किसी के भी मन की बातें पढ़ लेती हैं। जरूर ही इस औरत ने दीर्घ एकाकी जीवन जिया होगा। यही वजह हो सकती है कि एकाकीपन ने उसे इतना संवेदनशील बना दिया कि पलक झपकते ही वह हवा की गंध, पानी का रंग और किसी के दिल की व्यथा सब कुछ पढ़ लेती है , उदाहरण के तौर पर उसने एक ही निगाह में पारामिता की नफरत को पढ़ लिया था।

हेमा बेहरा की बातचीत से पता चलता था कि वह अपने पति से संतुष्ट नहीं थी। बातों-बातों में उनकी शिकायत करती रहती थी । जबसे उसे होश आया था तबसे वह अपने पति को गालियाँ दिए जा रही थी। जबकि उसका पति दिखने में बड़ा ही भद्र व सहनशील स्वभाव का दिख रहा था। अपनी पत्नी की हर प्रकार की बातें मान लेता था, यहाँ तक कि कई बार तो उसकी बेतुकी बातों को भी सहन कर लेता था। फिलहाल उसका ऑपरेशन हुए एक ही दिन बीता था, वह मछली-भात खाने की जिद्द करने लगी। उसके पति ने नर्स और नर्सिंग स्टाफ की आँखों में धूल झोंककर उसके लिए मछली-भात का प्रबंध किया । उसने एक दिन पारामिता की मम्मी से भी कहा था-

मौसी, मैं उसको कुछ भी नहीं कहता हूँ, उसके जो मन में आए, वह करे। बचपन से ही उसके माँ-बाप नहीं हैं, इसलिए मैं कभी भी इसको डाँट-फटकार नहीं करता हूँ। पाँच बीघा जमीन भी इसके नाम से करवा दिया हूँ। एक बड़ा-सा घर भी बनवा दिया हूँ। सोने-चांदी के जेवर भी तैयार करवा दिया हूँ। भगवान की दया से उसके पास किसी भी चीज की कमी नहीं है। मौसी ! सब कुछ है हमारे पास, मगर बच्चा नहीं है।

शादी हुए कितने साल हो गए हैं ?”

सोलह साल

जानती हो, मौसी, मैं बच्चे के लिए और आशा नहीं रखता हूँ, पर पता नहीं, कैसे उसको मिर्गी (अपस्मार) का रोग लग गया। चूँकि वह निपट अकेली रहती है मिर्गी का दौरा पड़ने से कब क्या हो जाएगा ? यही सोचकर बीच-बीच में डॉक्टर के पास दिखलाने के लिए ले आता हूँ। परन्तु इसका यहाँ आने का मन बिल्कुल नहीं था।

हाँ, कितना झूठ बोलते हो ? तुम्हारा मन था ? दस चिट्ठी लिखने के बाद तो तुम आए हो, वह भी मानो मुझ पर अहसान कर दिया हो। हाँ..., मुझे क्या हो जाता ? जैसे ही यहाँ से घर जाऊँगी बढ़िया खाना बनाऊँगी, खाऊँगी, पीऊँगी और मजे करूँगी। किसके लिए बचाऊँगी ? कौनसा मेरा वारिस है ? और कौन है जो खाएगा ? ये तो कलकत्ता चले जाएँगे। मैं तो इनके दूसरे भाइयों से अलग रहती हूँ।

धीरे से फुसफुसाते हुए वह बोलने लगी-

जानती हो ! ये दूसरी शादी करना चाहते हैं। एक लड़की भी देख चुके हैं। सिर्फ समाज को दिखाने के लिए मुझे यहाँ ले आते हैं। हाँ, मेरे पास तो बहुत सारे जेवर हैं ? खेती-बाड़ी है, घर द्वार है। और मुझे क्या चाहिए ? मुझे और किसी सामान की जरूरत है क्या ?”

पारामिता कहने लगी, “हाँ, सब कुछ तो है, और क्या चाहिए ?”

कहते-कहते यह बात पारामिता के हृदय में अटक गई। क्या कोई इंसान अपनी जिंदगी में केवल ये सब चीजें चाहता है ? सिर्फ ये ही सब ? अगर पारामिता को ये सब चीजें मिल जातीं, तो क्या वह खुश रहती ? विशाल दिलवाली होने के बावजूद भी पारामिता को सब कुछ सूनासूना लग रहा था उसके जीवन और उस औरत की सभी संभावनाएँ धूमिल होती नजर आ रही थी तभी तो इस प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग वह कर रही थी ?

कैलेण्डर के सभी पन्नों को

फाड़कर, मैं खड़ी हूँ

मुहूर्तों की सलाखों के पीछे

बंदी बन

समयहीन हो गई हूँ

मेरे सामने हो तुम

जागरण में

नींद में

सुख में

दुःख में

मगर भीषण ताप से

पसीना बह जा रहा है

इस शरीर से

दिल में जाग उठी

एक प्रचंड प्यास

मेरे सामने

वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़

मानो कुछ भी नहीं हैं।

सन क्लीनिक, कटक

भारत, पृथ्वी, ग्रह, तारा, आकाश

मानो कुछ भी नहीं हैं।

सिर्फ तुम हो

और मैं हूँ

मुहूर्तों की सलाखों के पीछे

बंदी बन

समयहीन हो गई हूँ

पर भीषण ताप से

पसीना बहा जा रहा है

इस शरीर से

दिल में जाग उठी है

एक प्रचंड प्यास।

हमें याद नहीं हैं, सन क्लीनिक, तुलसीपुर, कटक शहर। याद नहीं हैं, बादामबाड़ी बस-स्टैण्ड रिक्शा-स्टैण्ड। भूल गए हैं, दौल-मुण्ड़ाई में लस्सी की दुकान पर घंटों-घंटों कतारों में खड़ा रहना।

याद नहीं हैं, दोपहर के शो में आर्ट-फिल्मों को देखना। भूल गए हैं विनोद बिहारी में प्रकाशक लोगों के कृत-कृत्य होने का छद्म रूप।

हमें याद नहीं हैं, किसी जन्म में कोयला खदान में एक नीड़ बनाने के खेल में रमना।

एक लकडहारे की भाँति चावल लेकर लौट आता था पार्थ जंगलनुमा बाजार से और पारामिता किसी पहाड़ की तलहटी के नीचे बैठकर अपनी छोटी-सी सपन कुटिया को सुबह गोबर से लीप-पोतकर साँझ को घी का दीया जलाकर, शंख-ध्वनि कर ईश्वर को याद करती थी।

हमें याद नहीं वह हमारा जीवन, वह हमारा जन्म।

अब मैं मुहुर्तों की सलाखों के पीछे बंदी बन बैठी हूँ परन्तु समयहीन होकर। मेरे सामने केवल तुम हो। मेरे सामने चराचर जगत कुछ भी नहीं है, फिर भी भीषण ताप से मेरा शरीर पसीने से तर-बतर होता जा रहा है। दिल में एक प्रचंड प्यास जाग उठी है। कैलेण्डर के सारे पन्ने शैवाली फूल की पंखुडियों की तरह गिर गए हैं, समयहीनता की तेज धूप पाकर।

इसी दौरान पारामिता को दो-तीन बार आभासी-दर्द हो गया था। दर्द से कमर, पीठ, हाथ-पैर सब टूटते नजर आ रहे थे। पारामिता मुँह बंदकर इस यंत्रणा को सहन कर रही थी, साथ ही साथ किसी के आने की प्रतीक्षा में उल्लसित भी हो रही थी। मानो लंबे अर्से के बाद स्थिर जलाशय में एक तरंग-उर्मिका उठी हो। सब कोई तैयार हो जाते थे। सारे प्रोग्राम निरस्त कर देते थे। बचे-खुचे काम जल्दी-जल्दी निपटा लेते थे। फिर केवल बैठे रह जाते थे पारामिता से होने वाले बच्चे के इंतजार में। उसको चारों तरफ से घेर कर बैठ जाते थे। कभी-कभी नर्स को पहले से ही बोलकर रखते थे, तो कभी डॉक्टर दो अँगुलियों से जाँच कर जाते थे यह कहकर, “अगर और दर्द बढेगा तो खबर करना।

मगर तीन-चार घंटे के बाद दर्द समाप्त हो जाता।

दर्द क्या ? आभासी दर्द क्या ? कुछ भी पता नहीं था पारामिता को। इसका मतलब शायद आभासी दर्द में दर्द का कोई भी महत्व नहीं है। सभी लोग तो यही बात कहते थे। उसने सुन रखा था, कि इस दुनिया में प्रसव-पीड़ा से बढ़कर कोई दूसरी पीड़ा नहीं है। एक दिन डॉक्टर ने भी यही बात बताई थी। यही कारण है आजकल की लड़कियाँ प्रसव-शूल झेलना नहीं चाहती हैं, अतः सीजेरियन करवाना अधिक पसंद करती हैं।

लेकिन पारामिता सीजेरियन के लिए राजी नहीं थी। पारामिता ही नहीं, उसके घर का कोई भी सदस्य नहीं चाहता था कि पारामिता का सीजेरियन बच्चा पैदा हो। अभी कुछ दिन और शेष थे, कुछ दिन और प्रतीक्षा की जा सकती थी।

डॉक्टर के मुँह से एक बार सीजेरियन शब्द सुनकर पारामिता फिर कभी शांति से नहीं बैठ पाई। उसे इस बात का अहसास हो गया था, जरूर ही डॉक्टर उसके सीजेरियन से बच्चा पैदा करेंगे। हर दिन जब भी वह डिलेवरी-तालिका देखती थी, तो इस बात को जरूर चेक करती थी कि कितने सीजेरियन बच्चे पैदा हुए हैं तो कितने बच्चे सामान्य प्रसव से। वह मानसिक तौर पर इतना डर चुकी थी कि जब भी कोई डॉक्टर राउन्ड पर आता था, उससे अपने बच्चे की स्थिति तथा आकार के बारे में जरूर सवाल पूछ बैठती थी। आगे यह भी पूछने से नहीं चुकती थी-

डॉक्टर, जब बेबी का आकार इतना छोटा है तो सीजेरियन की क्या आवश्यकता है ? प्रायः किस-किस अवस्था में सीजेरियन की जरूरत पड़ती है ? सीजेरियन करने के कितने दिन पूर्व आप इस बात का निर्णय लेते हैं ?”

पारामिता के इन सभी सवालों का जबाव देते थे डॉक्टर। परन्तु कोई-कोई डॉक्टर यह भी कह देते थे कि आप बहुत जल्दी ही नर्वस हो जाती हो। सीजेरियन तो छोटा-सा ऑपरेशन है। इसके अलावा, आपके तो अभी और दिन बाकी हैं । इसलिए प्रोफेसर साहब आपकी शारीरिक व मानसिक अवस्था देखकर ही निर्णय लेंगे। आप किसी भी प्रकार की चिंता-फिक्र मत कीजिए। पारामिता अब तक प्रत्येक रूम का चक्कर काट चुकी थी। कोई भी सीजेरियन केस सामने आने से, सीजेरियन होने के कारणों के बारे में अवश्य पूछती। कभी-कभी नर्सिंग होम के प्रबंधन को उसके लिए दायी मानती। पैसों के लिए डॉक्टर लोग कई केस जान-बुझकर सीजेरियन कर देते हैं। पारामिता दिल से कभी सीजेरियन नहीं चाहती थी, परन्तु सामान्य-प्रसव के लिए भी उसका धैर्य नहीं था।

यहाँ भर्ती होने से पहले उसने क्या-क्या सोच रखा था ? उसे इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि यहाँ आने के बाद इतना कष्ट भुगतना पड़ेगा । सारी रातें स्वप्नहीन हो जाएँगी ? वह तो सिर्फ उस दिन अपने साधारण चेक-अप के लिए यहाँ आई थी। चेक-अप करने के बाद डॉक्टर पार्थ से बोले थे-

देखिए, इनके लिए बार-बार बस में आना-जाना सुरक्षित नहीं है। बेहतर यही रहेगा कि कटक में कहीं रूक जाइए।

कटक में रहने के लिए ऐसी तो कोई सुविधाजनक जगह हमारे लिए नहीं है। हमारा कोई नजदीकी रिश्तेदार भी यहाँ नहीं रहते हैं, जिनके घर पर एक-दो महीनों के लिए रूका जा सके। अभी से कटक में रहना पडेगा, डॉक्टर ?” पार्थ ने कहा।

रहना, न रहना तो आपकी मर्जी पर निर्भर करता है। मेरा तो फर्ज था यह बताना कि यह कोई मामूली डिलेवरी-केस नहीं है। बहुत ही जटिल केस है, अन्यथा मैं आपको यहाँ रूकने के लिए क्यों कहता ? हमारे लिए भी यह एक नया प्रयोगात्मक केस है।पर्ची पर कुछ लिखते हुए डॉक्टर ने कहा था।

तीन साल के बांझपन (बंध्यात्व) के बाद पारामिता का यह पहला गर्भ था, जिससे मातृत्व-सुख की आशा की जा सकती थी। तरह-तरह के चिकित्सीय-परीक्षण, कई एक्स-किरणों और विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ खाने के उपरांत भी हारमोन टेस्ट करवाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (एम्स) जाना पड़ा था। वहाँ पर गोनाडोट्राफिन ट्रीटमेंट के बाद ही उसे यह मातृत्व सुख प्राप्त हुआ था। अपनी तरफ से तो सारी आशाएँ छोड़ चुकी थी वह। पूरी तरह से हताश हो गई थी। दस-पन्द्रह हजार का खर्चा भी हो गया था। परन्तु उसको कोई फायदा नहीं हुआ था जैसे अकालग्रस्त भूमि में कोई भी बीज अंकुरित नहीं हो पाता है। इसलिए गोनाडोट्रोफिन ट्रीटमेंट में मिली सफलता से न केवल पारामिता व पार्थ, बल्कि उनके सभी परिजन, मित्र, यहाँ तक कि चिकित्सा करने वाले डॉक्टरों की भी खुशी की कोई सीमा नहीं रही। लम्बे अर्से के अथक परिश्रम व अर्थ-व्यय व लम्बे समय के बाद मिली सफलता सभी के लिए मूल्यवान थी। शायद यही वजह थी सभी अत्यंत सावधानीपूर्वक काम कर रहे थे। डॉक्टर ने डेढ-मास पूर्व ही उसको नर्सिंग-होम में भर्ती करने की सलाह दे दी थी। पारामिता के पापा न केवल नर्सिंग-होम का डेढ़ महीने का खर्चा उठाने के लिए तैयार थे बल्कि खुद के लंबे-चौड़े कारोबार को बंदकर बेटी के साथ रहने के लिए सहमत हो गए थे। पार्थ भी डेढ़ महीने की छुट्टी लेकर वहाँ आने के लिए व्यग्र हो उठा था।

जब पारामिता का कटक में रहना सुनिश्चित हो गया था, तब पारामिता व पार्थ साथ ले जाने वाले सामान को लेकर कल्पना सागर में डूब गए थे। बाल्टी, मग, साबुन, तेल, टिफिन कैरियर, फ्लास्क, दरी, तकिया और क्या क्या....। कटक में डेढ़-महीने रहने के दौरान वे क्या-क्या करेंगे ? कितनी आर्ट-फिल्में देखेंगे ? कितने दोस्तों से मुलाकात करेंगे ? रिक्शे में बैठकर किन-किन दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करेंगे ?

परन्तु पच्चीस तारीख की सुबह जब पारामिता कटक शहर पहुँची, कार से उतरकर सीधे नर्सिंग-होम में गई, तो फिर बाहर नहीं निकल पाई। कटक शहर कहने से उसे मिला था केवल दस फुट गुणा बारह फुट आकार का एक कमरा, ऑपरेशन थियेटर में जलती हुई लाल-लाईट, एक लंबा बरामदा और खिडकी में झाँकने से दिखता था दो मंजिले मकान के बरामदे में टहलता हुआ एक अलसेशियन कुत्ता और चौपाए पशु की भाँति चलती हुई-एक बूढ़ी। बस, इतना ही। खाली बैठी-बैठी पारामिता बीस-पच्चीस चिट्ठियाँ लिख चुकी थी उन सभी जान-पहचान वालों को, जो कॉलेज चौक से लगाकर चाँदनी चौक तक रहते थे। न तो किसी ने कुछ उत्तर दिया था और न ही उसे कोई देखने आया था। ऐसा लग रहा था मानो सारे जान-पहचान वाले लोग कटक शहर छोड़कर कहीं और चले गए हैं या फिर कल तक जो लोग चिट्ठी देते थे, आज वे सब भूल गए हैं कि पारामिता नामक जान-पहचान वाला जीव कोई उनके जीवन में आया भी था । इस तरह से पारामिता नर्सिंग-होम के एक कैबिन में कैद होकर रह गई थी। जब वह खिड़की से देखती तो दिखता था, एक टी.वी टॉवर और विस्तृत मैदान के साथ-साथ कटक शहर के कुछ भग्नावशेष।

ना तो उसे किसी प्रकार का कोई सेलाइन चढ़ा था ना कोई पट्टी बँधी थी, ना ही उसे समय-समय पर दवाई खानी थी और ना ही किसी प्रकार का इंजेक्शन लेने का कोई झमेला था। पारामिता को ऐसा लग रहा था मानो वह किसी रोगी की भूमिका में यहाँ अभिनय करने आई हो। अस्पताल की सफेद चादरें, सफेद तकिएँ, मैकिनटोस रैगजीन पारामिता को हर समय याद दिला देते थे कि वह बीमार है और इस बात को वह हर बार भूलने की चेष्टा करती थी, इसलिए जानबूझकर अस्पताल की सफेद चादर पर अपनी छापा वाली चादर बिछा देती थी। मगर नर्सिंग होम के अंदर के परिवेश को किस चीज से ढ़कती ? आपरेशन के बाद सेलाइन लगी हुई बेहोश औरतों को, क्या वह बाहर फेंक सकती थी ? क्या वह आपरेशन थियेटर से बह रही ईथरीय गंध को हटा सकती थी ? क्या वह परिचारकों के चेहरे पर झलकती दुश्चिंताओं को मिटा सकती थी ? या क्या वह ब्लड-बैंक से निर्दिष्ट ग्रुप का ब्लड नहीं मिलने से हताश हुए लोगों की चिंता दूर कर सकती थी ? पारामिता उसी वातावरण में एक मूकदर्शक की भाँति थी। परन्तु ना किसी ईथर की गंध ना ही किसी प्रकार की कोई सलाइन, न किसी ब्लड बैंक से ब्लड की व्यवस्था करना, ना नर्स लोगों का आना-जाना और ना ही ड्रेसिंग गाउन पहनने की ललक.... इन सब चीजों से वह अलग थी।

एक महीने की छुट्टी लेकर जिस दिन पार्थ पहुँचा था, पारामिता बहुत खुश हुई थी उसको देखकर। उसे लग रहा था जैसे पार्थ उसका पति, चिर-परिचित पुरूष न होकर उसका प्रेमी हो। मन हो रहा था पार्थ के गले लगकर खूब रोएँ। कहाँ चले गए थे इतने दिन ? मैं यहाँ अकेली थी। तुम्हें मेरी याद भी नहीं आ रही थी। जानते हो यह वह कटक शहर नहीं है ना ही वह कॉलेज चौक स्टेशन का व्हीलर। कितना मायावी शहर है यह ! देखो, अपनों से कितनी दूरी बनाकर चल रहा है यह शहर !

पार्थ को देखने से ऐसा लग रहा था जैसे वह कुछ बोलने के लिए आतुर हो।

देखो, कितनी बाधाओं को पारकर आया हूँ मैं ? तुम्हारे बिना कैसे रह पाता मैं शांति से वहाँ ?”

पार्थ के इतना जल्दी आ जाने से पापा खुश नहीं थे। पहले से हुई बातों के अनुसार जब पार्थ आता तो पापा घर जाते। पर अब पापा घर जाने के लिए राजी नहीं हुए थे, इसलिए पहले से तय की हुई तारीख से एक सप्ताह पूर्व पार्थ को आया देख पापा कहने लगे थे-

इतनी जल्दी क्यों आ गए हो, बेटा ? तुम तो अगले सप्ताह आने वाले थे ना ? हमें कितने दिन यहाँ रूकना पड़ेगा ? क्या होगा, क्या नहीं होगा ? अभी से तो कहा नहीं जा सकता है। अभी से आकर यहाँ बैठ जाओगे तो जरूरत के समय तुम्हें छुट्टी मिलने में परेशानी होगी। जब आ ही गए हो, तो ठीक है। पारामिता को देखकर वापिस चले जाओ, वहाँ जाकर अपनी छुट्टी कैंसिल करवा देना, और फिर जरूरत के समय छुट्टी लेकर आ जाना।

लेकिन पार्थ कहाँ चुप रहने वाला था ! वह बिल्कुल नहीं चाहता था कि वापिस घर चला जाए। वह बोलने लगा -

आप क्या सोचते है जब मेरी इच्छा होगी, तब मुझे छुट्टी मिल जाएगी ? एक महीने की छुट्टी मंजूर करवाना कोई मामूली बात नहीं है। बल्कि बेहतर होगा कि आप चले जाएँ। आपको अपने व्यापार में बिना मतलब का काफी नुकसान भी पहुँच रहा होगा। अगर माँ जी भी चली जाएँ, तो कोई दिक्कत की बात नहीं है। जरूरत पडने पर मैं आप लोगों को खबर कर दूँगा। आप जानते ही हैं यहाँ पर हम दोनों को किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी। वैसे भी दिन के समय बुआ के घर से खाना आ ही जाता है, और रात के लिए मैं किसी अच्छे होटल में व्यवस्था कर लूँगा। डिलेवरी होने में अभी काफी दिन बाकी हैं और अगर अकस्मात् जरूरत पड़ गई तो मैं आपको ट्रंक-काल कर दूँगा।

तुम क्या सोच रहे हो मुझे अपनी बेटी से प्यार नहीं है ? तुम्हारे कह देने से मैं घर चला जाऊँगा। एक सेकेंड भी मैं वहाँ शांति से नहीं रह पाऊँगा।

कहते-कहते, पता नहीं क्यों पापा की आवाज बदल गई थीं। पारामिता के पास कौन रहेगा या कौन नहीं रहेगा, इस बात को लेकर खूब बहसा-बहसी, तर्क-वितर्क हुआ था पापा और पार्थ के बीच में। अंत में कोई भी नहीं गया, न पापा, न पार्थ, न माँ।

इतनी बहस करते समय इन लोगों ने क्या यह बात नहीं सोची थी की इतनी छोटी-सी जगह में चार लोग कैसे रह पाएँगे ? खाने-पीने में क्या पहले जैसी संतुष्टि मिल पाएगी ? न रात को नींद और न दिन को चैन। इन लोगों के पास पर्याप्त समय होते हुए भी करने के लिए हाथ में कुछ काम नहीं होगा। कब वह समय आएगा जब वे सेलाइन लगे हुए हाथ को पकडने के लिए बेताब होंगे ? कब वे बोतल का ढक्कन खोलकर धीरे-धीरे मुँह में दवाई डालेंगे ? कब वे पारामिता के हाथ-पैर धीरे-धीरे दबाएँगे ?

यद्यपि पारामिता पहले से ही जानती थी कि पार्थ को गहरी नींद आती है, परन्तु पार्थ इतना आलसी और निद्रालु होगा, इस बात का उसे पता नहीं था। दस मिनट बाहर घूमकर आने से या कुर्सी पर एकाध घंटा बैठ जाने से वह इस हद तक थक जाता था कि जमीन पर दरी बिछाकर कभी भी सो जाता था। समय-असमय का कुछ भी ख्याल नहीं रखता था। निद्रालु पार्थ को देखने से कभी भी ऐसा नहीं लगता था कि वह एक बीमार आदमी का परिचारक बन कर आया है। कभी-कभी तो पारामिता के मन में अनावश्यक रूप से विरक्ति के भाव जाग जाते थे। पारामिता कहती थी -

हर समय आलसियों की तरह सोए रहते हो ?”

क्या काम है ? बोलो। मुझे क्या फालतू बैठने में मजा आता है ? मेरा क्या मन नहीं होता कटक शहर में रहने वाले अपने दोस्तों को जाकर मिलूँ ? पर तुम जानती हो, एक बार बाहर जाने से दस रूपए का खर्च आता है, पैदल जाना संभव नहीं है। तुम्हें अगर मेरा चेहरा देखना अच्छा नहीं लगता है, तो मैं नीचे चला जाता हूँ। जरूरत पड़ने से मुझे बुला लेना।

पारामिता को केवल पार्थ पर नहीं बल्कि अपनी माँ पर भी गुस्सा आ रहा था। पता नहीं क्यों, पत्थर-हृदय की औरत लग रही थी वह। आभासी दर्द हो या असली दर्द, दर्द तो दर्द ही होता है ! पारामिता के बदन में जोरों से दर्द हो रहा था मानो प्राण निकल जाएँगे। परन्तु माँ बिल्कुल हाथ भी नहीं लगाती थी। हरबार क्या पारामिता अपने मुँह से बोलती-

, माँ, मेरे हाथ-पैर थोडे से दबा दे, दर्द हो रहा है।

पारामिता को कष्ट होता देख सहानुभूतिवश पार्थ थोड़ा-बहुत सहला देता था। उसको सहलाते हुए देखकर भी माँ तो ऐसे निर्विकार बैठी रहती थी, जैसे यह काम उसका ही है। लोग देखने से क्या कहेंगे ? माँ नहीं रहती तो एक अलग बात होती।

असल में पारामिता नहीं चाहती थी, उसके लिए तीन आदमी व्यर्थ में अपना समय गँवाए और व्यर्थ में अपने पैसों की बरबादी करें। प्रतिदिन साठ से सत्तर रूपए का खर्च आता था, उसके अलावा स्वीपर, नर्स आदि को चाय-पानी का अलग से खर्च देना पड़ता था।

पारामिता सोच रही थी काश वह छुपकर घर भाग जाती और ये लोग ऐसे ही मूक-दर्शक बनकर बैठे रहते !

जयंती ने पारामिता को आवाज दी। पीछे मुडकर उसको देखने लगी। बड़ी ही चिन्तित दिख रही थी वह। पूछने लगी-

आपके पास पचास रूपए हैं क्या ?”

देख रही हूँ, कोई जरूरी काम है ?” पारामिता बोली।

माँ, गुस्से से बस-स्टैण्ड चली गई है। यह कहकर कि वह ब्रह्मपुर जाएगी।जयंती ने पारमिता से पचास रूपए लेकर अपने पति को दिए।

तुम साइकिल लेकर जल्दी उनके पीछे जाओ। वह बहुत गुस्से में गई है, कहीं ऐसा न हो किसी दूसरी बस में बैठकर अन्यत्र चली जाए।

जयंती के पति तेजी से निकल गए थे।

पारामिता ने आगे पूछा सुबह तो सब ठीक-ठाक था, पर अचानक अभी ऐसा क्या हो गया ?”

होगा क्या ?”

जयंती बोली, “माँ हमारे लिए हर रोज बाहर से उबली हुई स्वादहीन सब्जी लाती थी, उस सब्जी को खाने का मन नहीं कर रहा था इसलिए मैंने अपने पति से बाहर किसी होटल से आलूचाप व दूसरी सब्जी लाने के लिए कहा । आज माँ ने उनको खाने का यह सामान लाते हुए देख लिया तो माँ को गुस्सा आ गया। कहने लगी तुम लोग मुझसे छिपा-छिपाकर अच्छी-अच्छी चीजें खा रहे हो, मौज-मस्ती कर रहे हो, और मुझे पूछते तक नहीं। मैं यहाँ खाना बनाकर धूप में इधर से उधर हो रही हूँ और तुम लोगों को बाहर होटल का खाना स्वादिष्ट लग रहा है, तो फिर मेरी यहाँ क्या जरूरत है ?”

यह कहकर जयंती रोने लगी। रोते-रोते कह रही थी। माँ की इच्छा, अगर वह जाना चाहती हैं तो जाएँ।

टोकरी से सेव निकालकर पारामिता उनको काटने के लिए चाकू खोज रही थी, तभी देखा जयंती की माँ हडबड़ाकर रूम के अंदर घुस रही थी।

अरे ! मौसी तो आ गई।

आप गए नहीं ?” जयंती ने पूछा।

कैसे जाती ? बस एक घंटे बाद जाएगी।

सृजन-प्रक्रिया पूर्णतया यांत्रिकी और

रसायनिकी के सूत्रों की तरह अकवितामय

पूछो, प्रसव-पीडा से छटपटाती उस प्रसूता को,

पूछो, दूरबीन से झाँक रहे खगोलशास्त्र के उन वैज्ञानिकों को,

पूछो, एपीस्टीमोलॉजी, ब्रीच, कन्ट्रेक्शन, सर्विक्स

प्लेसेन्टा को लेकर व्यस्त डॉक्टरों से उस कविता का पता।

इतना होने के बावजूद

गर्भमुक्त प्रसूता की आँखों के किसी कोने में आँसू

और होठों पर थिरकती संतृप्ति भरी हँसी।

कविता पैदा होती है रात के आकाश में

कविता उपजती है पहले सृजन

नवजात शिशु के हँसने और रोने में।

कविता क्या होती है ?

पूछो, रसायन प्रयोगशाला में काम कर रहे

अनभिज्ञ नवागत छात्रों को

पूछो, गर्भस्थ शिशु का पेट में पहले प्रहार

से भयभीत और उल्लासित माँ को

पूछो, प्लेनेटोरियम में टिकट बेचते

लड़कों से,

उस कविता का पता।

प्रज्ञा-चेतना से बाहर निकल कर

देखो, सृजन-प्रक्रिया पूर्णतया यांत्रिक

मगर सृष्टि कवितामय।

पारामिता अब तक एक यंत्र बन चुकी थी। जो कुछ भी बोला जाता, वह उसके लिए राजी हो जाती। चाहे सिजेरियन करे या नारमल, जो भी करे, वह मुक्ति चाहती थी। घर के अन्य तीन सदस्य भी अपना धीरज खो चुके थे। पापा जो कभी भी सीजेरियन के पक्ष में नहीं थे, अब कह रहे थे-

सीजेरियन करना चाहते हैं तो कर लेने दो। इसकी बड़ी बहिन के भी तो दो-दो बच्चे सीजेरियन ही पैदा हुए हैं। इसको देर से बच्चा हो रहा है इसलिए सीजेरियन होने की ज्यादा आशंका है।

पारामिता डॉक्टरों को पूछ-पूछकर परेशान कर देती थी, वही पुराना घिसापिटा जवाब उसे अच्छा नहीं लग रहा था। गर्भस्थ शिशु के हृदय की धड़कन 140 प्रति मिनट, रक्तचाप-सामान्य, कितना सुनती ? डॉक्टरों को भी इस बात का अहसास हो गया था कि यह मरीज बहुत ही संवेदनशील प्रकृति की है। कोई डॉक्टर गर्भ ठहरने से लेकर बच्चे की डिलेवरी तक बच्चों के विकास-क्रम व जीवन-प्रणाली के बारे में समझाते थे तो कोई डॉक्टर माँ की मानसिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस बारे में बताते थे। उनकी ये सब बातें सुनकर पारामिता क्या संतुष्ट हो जाती ? नहीं। उस दिन डॉक्टर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब पारामिता उससे बोली,

मैं सीजेरियन करना चाहती हूँ। आप जिस दिन चाहें, आपरेशन कर सकते हैं। उसके लिए मैं तैयार हूँ।

डॉक्टर हँस दिए थे। कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

आपका मन अचानक कैसे परिवर्तित हो गया ? लग रहा है आप बहुत बोर हो गई हो। जब आप इतने दिनों तक प्रतीक्षा कर चुकी हो, तो और कुछ दिन सही।

नहीं, और बिल्कुल नहीं।

देखिये मैडम, मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है। प्रोफेसर साहब जब निर्णय लेंगे, तभी किया जाएगा।

यह आपका कैसा नियम है ?” पापा ने पूछा था।

सीजेरियन करने के कितने दिन पहले आप निर्णय लेते हैं।

देखिए, यह निर्णय लेना बड़े डॉक्टरों के हाथ में है। शायद दो-तीन दिन पहले यह तय किया जाता है,फिर आपरेशन करने की पूर्व संध्या को हम एक तालिका बना देते हैं।

आगे अक्षय-तृतीया है । उस दिन करने से अच्छा होगा।पापा ने कहा था।

प्रोफेसर साहब को बोलकर देखिए।

यह कहकर डॉक्टर हँसते हुए चले गए थे। कुछ दिन बाद नर्सिंग होम के कार्यालय से पार्थ को कोई बुलाने आया था तथा पारामिता के लिये ब्लड की व्यवस्था करने की बात कहकर चला गया था। पार्थ का वह सारा दिन ब्लड की व्यवस्था के दौड-धूप में पार हो गया। कटक मेडिकल कॉलेज से निराश होकर दूसरे दिन सुबह पार्थ लौट आया था। पारामिता के ब्लड ग्रुप का ब्लड उपलब्ध नहीं था। पार्थ का ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिवतथा पापा का एबी पजिटिवथा। पार्थ अपने दो-चार दोस्तों से भी मिला था ताकि पारामिता के ब्लडग्रुप के ब्लड की व्यवस्था की जा सके।

पापा ने कहा था तुम थोडी और कोशिश करो, नहीं तो मैं घर जाकर किसी लड़के को लेकर आता हूँ।

लेकिन शाम को पारामिता के ग्रुप का ब्लड मिल गया था, न्यूरोसर्जरी के किसी एक डॉक्टर ने दिया था। पार्थ खुद अपना ओ नेगेटिवखून देकर बदले में ए पाजिटिवखून लाया था।

खून जुगाड़ करने के लिए कह रहे है, मतलब जरूर ही सीजेरियन करेंगे।पापा ने कहा।

ऐसा कोई जरूरी नहीं है, ऑफिस वाले कह रहे थे पहले से ही खून मँगाकर रख लेते हैं ताकि जरूरत पडने पर काम आ सके।

पार्थ रोज शाम को तालिका देखकर आता था, मगर पारामिता का नाम नजर नहीं आता था। न ही सीजेरियन की तालिका में, न ही सामान्य-प्रसव की तालिका में। पारामिता मुक्ति चाहती थी। कब मिलेगी उसे मुक्ति। जितने भी सगे-संबंधी, यार-दोस्त थे, प्रतीक्षा करती हुई पारामिता को देखकर जा चुके थे।

पारामिता के उदरस्थ-शिशु मुक्ति के लिए क्या ऐसे ही छटपटाता होगा ? उसकी तरह ऐसे ही व्याकुल होता होगा ? पारामिता सोच रही थी, शायद वह रास्ता ही भूल गया है। शायद वह निर्विकार, निर्विकल्प तपस्वी बनकर बैठ गया है । माँ बच्चे की प्रतीक्षा करते-करते थक गई थी। आखिरकर हारकर वह अपने घर चली गई थीं। बच्चे की प्रतीक्षा में पापा ने ढेरों जासूसी उपन्यास पढ़ लिए थे और उसी प्रतीक्षा में पार्थ के चेहरे पर दाढ़ी बाबाओं की तरह बढ़ गई थी, शर्ट मैला हो गया था, अँगुलियों के नाखून बढ़ गए थे, नाखूनों में मैल जमा हो गया था। मगर उसे देखो कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, एकदम निर्विकार व निर्विकल्प। डॉक्टर बारम्बार नापते थे गर्भस्थ शिशु के हृदय की धडकन 140 प्रति मिनट तथा रक्तचाप-सामान्य।

पापा रोटी लेने होटल गए हुए थे। पारामिता बैठकर जयंती के साथ बात कर रही थी। पार्थ अंधेरे में सिगरेट फूँक रहा था। तभी नर्स आकर बोली थी, “कल आपका ऑपरेशन है।

मुझे कह रही हो ?” चौंक गई थी पारामिता।

हाँ, आज रात को सिर्फ पावरोटी और दूध लेना। दरवाजा खोलकर रखना, डूस दिया जाएगा।

पार्थ तालिका देखने गया था, लेकिन आया हाथ में दवाई की एक पर्ची लेकर। पारामिता से पूछने लगा-

तुम्हारे पास कितने रूपये हैं ? मुझे पाँच सौ रूपये चाहिए। जल्दी जाना पडेगा नहीं तो दवाई की दूकान बन्द पड़ जाएगी।

पता नहीं क्यों, यह खबर सुनने के बाद, वह इतनी काँप रही थी कि रूपया भी ढंग से गिन नहीं पाई। नोटों का एक बंडल पार्थ को पकडा दिया । पारामिता, जयंती के साथ और कुछ बात नहीं कर पाई थी। दो स्लाईस से ज्यादा डबल रोटी भी नहीं खा पाई थी। ढंग से सो भी नहीं पाई थी। बिस्तर से बाथरूम, बाथरूम से बिस्तर, ऐसे पूरी रात जागते-जागते बिता दी। सुबह उसके गुप्तांग की शेविंग की गई तथा पहनने के लिए सफेद गाऊन दिया गया। फिर लाल लाइट जलते हुए डरावने कमरे के अंदर ले जाया गया। पार्थ और पापा बाहर खडे थे। पारामिता को ऐसा लग रहा था मानो चारों तरफ कुहासा छा गया हो और कुहासे के अंदर बहुत सारे लोग उसे घेरकर खड़े हैं। कुहासे के भीतर से किसी की आवाज सुनाई दी-

तुम्हारे बेटा हुआ है, बेटी।

धीरे-धीरे कुँहासे से पारामिता बाहर निकली तथा हाथ बढ़ाकर कुछ ढूँढने लगी। जब आँखे खोली तो देखा जयंती और उसके बेड के बीच में एक झूला आ गया है। कोई कह रहा था तुम्हारे बेटा हुआ है।

कितने ताज्जुब की बात है, देखो ! कल तक एक अलग दुनिया में जी रही थी पारामिता, आज उसकी दुनिया दूसरी हो गई है। इस दुनिया की रीति-नीति, मूल्य-बोध, सार्थकता उस दुनिया से बिल्कुल भिन्न है। कल तक अपने जिन स्तनों को अपना गोपनीय अंग मानकर छुपाकर रखती थी, आज उन्हीं स्तनों को सभी के सामने खोलकर स्तनपान करा रही थी वह। कौन लूटकर ले गया पारामिता की सारी शर्म-लाज को ? इस मातृत्व जगत की यह अद्भुत अनुभूति है। सब अश्लीलता इस जगत में शीलता में बदल जाती है। यहाँ सब स्वार्थपरता प्रेम के अनुरूप हो जाती हैं।

इन चंद आठ दिनों के अंतर्गत पारामिता को दुनिया में एक अलग उपलब्धि प्राप्त हो गई। उसे लग रहा था कि वह प्राप्ति कितनी तुच्छ है ! इस सामान्य-सी प्राप्ति के लिए इतना बडा संघर्ष ! अंततः चार सालों से आशा-आशंकाओं के बीच हर मासिक-धर्म के चौबीस घंटों के अंदर-अंदर कटक जाना पड़ता था, एन्डोमेटोरियम बायोप्सी की नेगेटिव रिपोर्ट वाले हारमोन-परीक्षा से जूझ रही थी पारामिता, सिर्फ इतनी तुच्छ प्राप्ति के लिए ! माँ बनने के बाद उसे लग रहा था मानो माँ बनना कोई बड़ी चीज नहीं है।

इसी प्राप्ति की आशा में मनुष्य अपना जीवन जीता है जैसे हेमा बेहेरा, जैसे वह बूढ़ा-बूढ़ी, जैसे जयंती। जिस स्नेह, प्रेम, ममता की प्राप्ति के लिए तड़प रहे थे वे लोग, कितना मूल्यहीन था वह !

इसी परिदृश्य में घुटनों के ऊपर मुँह रखकर उदास बैठी जयंती कविता बन गई थी।

आह, रे !पारामिता को जयंती के लिए दुःख लग रहा था। वह लड़की आज सुबह से कितनी उदास लग रही थी ! पार्थ, मम्मी-पापा घर लौटने की तैयारी में थे। पारामिता का सारा सामान बाँध दिया गया था। माँ ने सुराही जयंती को दे दी। बडे दुखी मन से जयंती ने सुराही को अपनी अलमारी में रखा। उसे लग रहा था जैसे उसके चारों तरफ से पृथ्वी विलीन होती जा रही हो।साथ ही साथ धूमिल होती जा रही थी प्रभात की चहल-पहल।

गाड़ी प्रतीक्षा में नीचे खडी थी। सब समान नीचे भेज दिया गया था। पारामिता अंतिम बार अपनी आधी जगह व बाथरूम को देखकर आ गई थी कि कहीं कोई सामान छूटा तो नहीं है। मम्मी के हाथ से बेटे को लेकर गोद में जकड़ लिया था जयंती ने। उसको चुंबन देते हुए रोने लगी।

जा रहे हो ?”

इस समय पारामिता को ऐसा लग रहा था कि अगर कोई देवदूत प्रकट होकर उसे कोई मनचाहा वरदान दे, तो वह सिर्फ एक ही वर माँगेगी और वह वर होगा जयंती के माँ बनने का। एकबार माँ बनकर वह भी उन कवितामय क्षणों का अनुभव करे, जो वास्तव में कितने अर्थहीन हैं !

Wednesday, September 30, 2009

गैरेज

यह कहानीकार की नवीनतम कहानियों में से एक है जो ओडिया की मशहूर पत्रिका 'कादम्बिनी' में प्रकाशित हुई थी और अब तक कहानीकार के किसी भी कहानी-संग्रह में संकलित नहीं हुई है . इस कहानी में निम्न-मध्यम वर्ग के वातावरण में पनप रही 'लूम्पेन मानसिकता' का बखूबी कलात्मक चित्रण किया गया है जो पाठक को अभिभूत कर लेती है.

गैरेज



“कैसी हो तुम?”
“ठीक नहीं लग रहा है।” वह उदास मन से बोली। यद्यपि उसके होठों पर हँसी के भाव थे, मगर चेहरे पर घोर मायूसी छाई हुई थी । वह बिल्कुल भी सहज नहीं लग रही थी। उसे देखने से तो ऐसा लग रहा था मानो आकाश से कोई अनचाहा तारा टूटकर धरती पर गिर पड़ा हो।
“क्यों? क्या हो गया, जो ठीक नहीं लग रहा है ?”
“मुझसे बहुत बडी ग़लती हुई है। अब मैं नहीं भुगतूँगी, तो कौन भुगतेगा ?” उसकी आँखे लाल-लाल दिखाई दे रही थी जैसे कल रात वह बिल्कुल भी सोई नहीं हो।
“ग़लती?”
“हाँ।” वह सोफे पर अपनी अँगुलियों को थिरकाते हुए बोलने लगी, “मैं यहाँ रहूँगी।”
“मतलब?”
“मैं और कहीं नहीं जाऊँगी।”
तीशा मीरा की ओर देखने लगी। मीरा अपने आँचल में एक कमज़ोर निस्तेज बच्चे को चिपकाए हुए थी जो उसका बड़ा बेटा था। एक और छोटा बच्चा नीचे खड़े होकर “ऐ माँ, माँ !” पुकारते हुए उसकी साड़ी खींच रहा था। उन दोनों बच्चों को लेकर वह उसके घर में रहेगी ? तीशा को चुपचाप खड़ा देखकर, पता नहीं, मीरा ने क्या समझा । वह ख़ुद बोलने लगी, “मैं अपना सिर छुपाने के लिए आपके गैरेज में रह जाऊँगी ....”
“गैरेज में?”
“हाँ, आपकी कार के पास में।”
“क्या कह रही हो, गैरेज में कार के पास दो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर रहोगी ?”
इससे पहले तीशा ने कई बार उसको कुछ नए काम आरम्भ करने के बारे में प्रस्ताव दे चुकी थी । “चलो, हम अपनी कार को एक शेड़ के नीचे रखवा देंगे तथा गैरेज में एक ब्यूटी-पार्लर खोलेंगे। तुम तो जानती ही हो, साहब सुबह घर से चले जाते हैं और लौटते हैं शाम के बाद। वैसे भी मैं घर में बिना काम के बैठे-बैठे एकदम बोर हो जाती हूँ। क्या करूँगी दिनभर ख़ाली बैठे-बैठे ? अगर हम एक ब्यूटी-पार्लर खोल देते हैं, तो क्या उसको चलाने में तुम मेरी मदद नहीं करोगी ? तुम तो बहुत अच्छा थ्रेडिंग करती हो । अभी जब मैं तुम्हे घर में काम करने के लिए तीन सौ रुपये महीना पग़ार देती हूँ । नया काम प्रारम्भ होने की अवस्था में मैं तुम्हे एक हज़ार रुपये दूँगी । अभी से स्पष्ट कह देती हूँ। अगर पार्लर अच्छा चलेगा, तो और ज़्यादा पैसे दूँगी।”
तीन सौ रुपये से बढ़कर एक हज़ार रुपये पाने की आशा में मीरा की आँखे चमक उठी थी । वह दुगुने उत्साह के साथ बोली, “आप मुझे तरह-तरह की डिजाइन वाले बाल काटना और अच्छे ढंग से सिखा देना।”
“अवश्य, यह काम तुम अच्छे ढंग से कर सकती हो।” तीशा बोली, “उस बार जब तुमने मेरे ‘स्टेप-कट-बाल’ काटे थे, क्लब में किसी को भी विश्वास ही हो पाया था कि तुम्हारे अदक्ष हाथों में इतनी दक्ष-कला है !”
ऐसे ही बैठे-बैठे, तीशा और मीरा हवाई किले बनाती थीं और कुछ समय बाद हक़ीक़त की दुनिया में लौट आती थीं। फिर से अनमने भाव से अपने-अपने संसार के सुख-दुख में गोते लगाने लगती थीं। गैरेज, पार्लर में और नहीं बदलता था। गैरेज को पार्लर में बदलने के अनुमानित ख़र्चे के विस्तृत विवरण वाली छोटी कॉपी ऐसे पड़े-पड़े ही एक दिन रद्दी की टोकरी में खो जाती थी। जिसमें लिखा हुआ होता था मशीनों तथा उनकी एसेसरीज, फ़र्नीचर, कँधी-कैंची आदि सामानो का ख़र्च। थोडे ही दिनों के बाद तीशा पूर्ववत् मालकिन की, तो मीरा नौकरानी की भूमिका में आ जाती थी, फिर से तीशा मीरा की छोटी-छोटी ग़लतियाँ ढूँढकर डाँटना शुरू कर देती थी।
कुछ ही दिन बीते होंगे, तीशा फिर से कहने लगी, “मीरा, जानती हो ! आजकल तो गली-गली में पार्लर खुल गए हैं । ब्यूटीशियन लडकियाँ घर-घर सेल्स-गर्ल की भाँति जाकर पेड़ीक्योर, मेनीक्योर, फ़ेशियल आदि करती हैं। पार्लर खोलने से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं है, कडी-प्रतिस्पर्धा का भी सामना करना पडेगा। अच्छा होगा, हम एक ‘हेल्थ-क्लब’ खोलें। ऐसे भी आजकल की औरतों में तो दुबली-पतली दिखने का फ़ैशन चल रहा है। देखना, कॉलोनी के अंदर हेल्थ-क्लब खोलने से बहुत भीड़ लगेगी। ये औरतें कहीं और नहीं जा पाती हैं। यहाँ हेल्थ-क्लब खुलने से, जब उनको फ़ुर्सत मिलेगी, आ सकेगी। हम लोगों को करना भी क्या है ? सिर्फ़ क़सरत करने के कुछ उपकरण व अन्य सामान लाकर रख देने से अपना काम हो जाएगा। ज़्यादा से ज़्यादा, टर्किश टॉवेल और साबुन भी रख देंगे। उससे ज़्यादा, बगीचे में जो नल लगा हुआ है, उसके पास एक छोटा-सा बाथरुम बना देंगे। नहाने की भी सुविधा हो जाएगी। बाक़ी और क्या रह जाएगा ? बता तो। हाँ, हाथ धोने के लिए एक बेसिन ज़रूर लगाना पडेगा, पर उसमें कोई ज़्यादा ख़र्च नहीं आएगा। हम एक काम करेंगे, सभी सदस्यों से हर महीने शुल्क के तौर पर कुछ न कुछ रुपए लेंगे। तुम्हारा काम क्या है ? जानती हो, केवल गैरेज की साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना। तुम्हारे ऊपर काम का और ज़्यादा बोझ भी नहीं डालूँगी, अब तो राजी ?”
मीरा हँसकर बोली थी
“मैं क्या करूँगी ? मुझे नहीं पता, ये सब चीज़ें क्या होती हैं ?”
“तुमने टी.वी. में नहीं देखा है ? ऐसे बोल रही हो मानो कुछ भी मालूम नहीं हो। इतनी भोली मत बनो।” चिढ़ गई थी तीशा। फिर एक दिन टी.वी. प्रोग्राम में उसको हैल्थ क्लब में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों को दिखलाया।
“जानती हो मीरा ! अगर हम भाप-स्नान तथा मालिश की भी व्यवस्था कर दें, तो सोने पर सुहागा...”
“ये सब क्या होता है?”
“कुछ भी नहीं। बहुत छोटी-सी चीज़ें है। किसी भाप स्नान के इच्छुक व्यक्ति के शरीर पर तेल और क्रीम की मालिश करके बाथरुम में कंबल ओढाकर बैठा दीजिए। फिर एक पाइप से बाथरुम में भाप छोडिए। बस, अपने आप ही उनकी चमड़ी साफ़ हो जाएगी और उनका शरीर सुन्दर व स्वस्थ दिखने लगेगा।”
“मालिश और आदमियों की ? ना, बाबा ना”
“धत् ! आदमियों की नहीं, सिर्फ़ औरतों की। इस काम के लिये तुमको कुछ अतिरिक्त रूपए-पैसे भी दूँगी, चिन्ता मत करो।”
इस बार भी गैरेज हैल्थ-क्लब में नहीं बदला। इस उम्र में मीरा का मन बहुत चंचल था। मीरा बहुत बेचैन रहती थी। आजकल वह ठीक ढंग से काम नहीं कर पा रही थी इसलिये तीशा उसको डाँटती थी।
ऐसा लग रहा था मानो मीरा के दो पंख निकल आए हो, जैसे ही उसको किसी का साथ मिलेगा वह फुर से उड़ जाएगी ।
एक दिन तीशा बोली, “देख, मीरा ! अ